आग Poetry (page 35)

इबारतें चमक रही हैं दिल में तेरे प्यार की

आयुष चराग़

हवस ने मुझ से पूछा था तुम्हारा क्या इरादा है

औरंगज़ेब

वो बात जिस से ये डर था खुली तो जाँ लेगी

आतिफ़ ख़ान

इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई

अतहर नफ़ीस

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अतहर नफ़ीस

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं

अतहर नफ़ीस

दिल की मसर्रतें नई जाँ का मलाल है नया

अतहर नफ़ीस

उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए

अतीक़ अंज़र

फूल पर ओस है आरिज़ पे नमी हो जैसे

अतीक़ अंज़र

मिरी ज़िंदगी किसी मोड़ पर कभी आँसुओं से वफ़ा न दे

अतीक़ अंज़र

जिस्म के घरौंदे में आग शोर करती है

अतीक़ अंज़र

शजर से मिल के जो रोने लगा था

अतीक़ अहमद

क्या क्या न प्यास जागे मिरे दिल के दश्त में

अता तुराब

तन्हाइयों के दश्त में भागे जो रात भर

अता तुराब

तुझ को ख़िफ़्फ़त से बचा लूँ पानी

अता आबिदी

साँसों के तआक़ुब में हैरान मिली दुनिया

अता आबिदी

तिफ़्ली के ख़्वाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

शिकवा-ए-मुख़्तसर

असरार-उल-हक़ मजाज़

साक़ी

असरार-उल-हक़ मजाज़

रात और रेल

असरार-उल-हक़ मजाज़

नज़्र-ए-अलीगढ़

असरार-उल-हक़ मजाज़

मुझे जाना है इक दिन

असरार-उल-हक़ मजाज़

इंक़लाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

फ़िक्र

असरार-उल-हक़ मजाज़

दिल्ली से वापसी

असरार-उल-हक़ मजाज़

बर्बत-ए-शिकस्ता

असरार-उल-हक़ मजाज़

अँधेरी रात का मुसाफ़िर

असरार-उल-हक़ मजाज़

सुलग रहा हूँ ख़ुद अपनी ही आग में कब से

असरार ज़ैदी

बरहनगी का मुदावा कोई लिबास न था

असरार ज़ैदी

पहचान ज़िंदगी की समझ कर मैं चुप रहा

असरार अकबराबादी

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