बात Poetry (page 15)

वो कम-सुख़न न था पर बात सोच कर करता

तैमूर हसन

मोती नहीं हूँ रेत का ज़र्रा तो मैं भी हूँ

तैमूर हसन

मैं ने बख़्श दी तिरी क्यूँ ख़ता तुझे इल्म है

तैमूर हसन

बहाऊँगा न मैं आँसू न मुस्कराउँगा

तैमूर हसन

ये एक बात समझने में रात हो गई है

तहज़ीब हाफ़ी

वो जिस की छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं

तहज़ीब हाफ़ी

तमाम नाख़ुदा साहिल से दूर हो जाएँ

तहज़ीब हाफ़ी

ये एक बात समझने में रात हो गई है

तहज़ीब हाफ़ी

न नींद और न ख़्वाबों से आँख भरनी है

तहज़ीब हाफ़ी

इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं

तहज़ीब हाफ़ी

बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता

तहज़ीब हाफ़ी

तिरी गली में गए कितने माह ओ साल हुए

तहसीन फ़िराक़ी

जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी

ताहिर फ़राज़

गोशे बदल बदल के हर इक रात काट दी

ताहिर फ़राज़

अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुइ

ताहिर फ़राज़

आप हमारे साथ नहीं

ताहिर फ़राज़

ये जो माज़ी की बात करते हैं

ताहिर अज़ीम

मैं उस की मोहब्बत से इक दिन भी मुकर जाता

ताहिर अज़ीम

बढ़ रहा हूँ ख़याल से आगे

ताहिर अज़ीम

मिट गए हाए मकीं और मकान-ए-देहली

तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ख़ान कौकब देहलवी

हर अदा तुंद और नबात उस की

ताबिश सिद्दीक़ी

ख़ता मैं ने कोई भारी नहीं की

ताबिश मेहदी

अजब यक़ीन सा उस शख़्स के गुमान में था

ताबिश कमाल

अजब यक़ीन सा उस शख़्स के गुमान में था

ताबिश कमाल

अज़ाब टूटे दिलों को हर इक नफ़स गुज़रा

ताबिश देहलवी

अश्कों के गुहर यूँ सर-ए-मिज़्गाँ भी न तोलें

तबस्सुम रिज़वी

ज़िंदगी दिल पे अजब सेहर सा करती जाए

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

वो रौशनी कि ब-क़ैद-ए-सहर नहीं ऐ दोस्त

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

क़ुसूर इश्क़ में ज़ाहिर है सब हमारा था

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मिलेगा दर्द तो दरमाँ की आरज़ू होगी

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

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