बात Poetry (page 13)

ज़ेहन के कैनवस को फैला कर

उमर फ़रहत

सफ़र की हद थी जो रात थी

उमर फ़रहत

मुसाफ़िरों से मोहब्बत की बात कर लेकिन

उमर अंसारी

कर अपनी बात कि प्यारे किसी की बात से क्या

उमर अंसारी

हो के उस कूचे से आई तो सितम ढा गई क्या

उमर अंसारी

हैं सारे जुर्म जब अपने हिसाब में लिखना

उमर अंसारी

कोई वादा न देंगे दान में क्या

तुफ़ैल चतुर्वेदी

मुस्कुराएगा मगर बात नहीं मानेगा

तुफ़ैल अहमद मदनी

वो तो मिल कर भी नहीं मिलती है

त्रिपुरारि

जाने फिर उस के दिल में क्या बात आ गई थी

त्रिपुरारि

दिल की बात न मानी होती इश्क़ किया क्यूँ पीरी में

तौसीफ़ तबस्सुम

यहीं आना है भटकती हुई आवाज़ों को

तौक़ीर तक़ी

कोई तासीर तो है इस की नवा में ऐसी

तौक़ीर तक़ी

बदन में रूह की तर्सील करने वाले लोग

तौक़ीर तक़ी

कर के सारी हदों को पार चला

तौक़ीर अहमद

फिर यही बात न मैं भूल सका

तौक़ीर अब्बास

अपने मंज़र से जुदा था इक दिन

तौक़ीर अब्बास

सदाक़त सादगी ओढ़े बुलंदी थाम लेती है

ताैफ़ीक़ साग़र

पर्वाज़ का था शौक़ मुझे आसमान तक

ताैफ़ीक़ साग़र

बे-मेहर कहते हो उसे जो बेवफ़ा नहीं

मीर तस्कीन देहलवी

चलो के मिल के बदल देते हैं समाजों को

तासीर सिद्दीक़ी

तू मेरा दोस्त मिरा यार है नहीं है क्या

तरकश प्रदीप

कोई रखता ही नहीं फिर भी रहा करता है

तरकश प्रदीप

करते हुए तवाफ़ ख़यालात-ए-यार मैं

तरकश प्रदीप

काम कुछ ऐसे कर गया हूँ मैं

तरकश प्रदीप

अपने दम से गुज़र औक़ात नहीं करता मैं

तरकश प्रदीप

नमी आँखों की बादा हो गई है

तारिक़ राशीद दरवेश

मेरा ग़म सारी काएनात का ग़म

तारिक़ राशीद दरवेश

इस लहजे से बात नहीं बन पाएगी

तारिक़ क़मर

जौन-एलिया से आख़री मुलाक़ात

तारिक़ क़मर

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