बात Poetry (page 24)

वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी

शारिक़ कैफ़ी

उदास हैं सब पता नहीं घर में क्या हुआ है

शारिक़ कैफ़ी

सियाने थे मगर इतने नहीं हम

शारिक़ कैफ़ी

सब आसान हुआ जाता है

शारिक़ कैफ़ी

कुछ क़दम और मुझे जिस्म को ढोना है यहाँ

शारिक़ कैफ़ी

ख़मोशी बस ख़मोशी थी इजाज़त अब हुई है

शारिक़ कैफ़ी

कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए

शारिक़ कैफ़ी

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

शारिक़ कैफ़ी

बड़ा है दुख सो हासिल है ये आसानी मुझे

शारिक़ कैफ़ी

दिखाई देंगे जो गुल मेज़ पर क़रीने से

शारिक़ जमाल

तलाश जिन की है वो दिन ज़रूर आएँगे

शरीफ़ कुंजाही

ज़ुल्म करते हुए वो शख़्स लरज़ता ही नहीं

शारिब मौरान्वी

जो आँसुओं की ज़बाँ को मियाँ समझने लगे

शारिब मौरान्वी

जो बात दिल में थी काग़ज़ पे कब वो आई है

शरीफ़ मुनव्वर

अपनी रूदाद कहूँ या ग़म-ए-दुनिया लिक्खूँ

शरर फ़तेह पुरी

कम-सिनी जिन की हमें याद है और कल की ही बात

शरफ़ मुजद्दिदी

कुछ इस तरह वो निगाहें चुराए जाते हैं

शम्स ज़ुबैरी

हम तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का गिला भी नहीं करते

शम्स ज़ुबैरी

किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या

शम्स तबरेज़ी

अपना घर भी कोई आसेब का घर लगता है

शम्स तबरेज़ी

ज़मीन तंग है यारब कि आसमान है तंग

शम्स रम्ज़ी

ये क्या अंदाज़ हैं दस्त-ए-जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ के

शम्स इटावी

वजूद-ए-बर्क़ ज़रूरी है गुलिस्ताँ के लिए

शम्स इटावी

हुस्न की बिजलियाँ अल-अमाँ अल-अमाँ

शम्स इटावी

मिरे ए'तिमाद को ग़म मिला मिरी जब किसी पे नज़र गई

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

दूर फ़ज़ा में एक परिंदा खोया हुआ उड़ानों में

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

बिछड़ते टूटते रिश्तों को हम ने देखा था

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

इक शख़्स तेरी बज़्म से ख़ामोश उठ गया

शमीम रविश

आँखों में हिज्र चेहरे पे ग़म की शिकन तो है

शमीम रविश

तिलिस्म-ए-सफ़र

शमीम क़ासमी

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