बात Poetry (page 25)

ये और बात कि गमले में उग रहा हूँ मैं

शमीम क़ासमी

राहगुज़र

शमीम करहानी

ज़बाँ को हुक्म ही कहाँ कि दास्तान-ए-ग़म कहें

शमीम करहानी

याद की सुब्ह ढल गई शौक़ की शाम हो गई

शमीम करहानी

शराब ओ शेर के साँचे में ढल के आई है

शमीम करहानी

शम्अ' पर शम्अ' जलाती हुई साथ आती है

शमीम करहानी

सहर को दे के नई निकहत-ए-हयात गई

शमीम करहानी

क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से हम को छुड़ा लिया

शमीम करहानी

निकल पड़े हैं सनम रात के शिवाले से

शमीम करहानी

ख़मोश किस लिए बैठे हो चश्म-ए-तर क्यूँ हो

शमीम करहानी

जुनूँ तो है मगर आओ जुनूँ में खो जाएँ

शमीम करहानी

जो मिल गई हैं निगाहें कभी निगाहों से

शमीम करहानी

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे

शमीम करहानी

जश्न-ए-हयात हो चुका जश्न-ए-ममात और है

शमीम करहानी

हमीं थे ऐसे सर-फिरे हमीं थे ऐसे मनचले

शमीम करहानी

गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

शमीम करहानी

दर्द-शनास दिल नहीं जल्वा-तलब नज़र नहीं

शमीम करहानी

साहिल पे लाई और सफ़ीने डुबो दिए

शमीम जयपुरी

रहम ऐ ग़म-ए-जानाँ बात आ गई याँ तक

शमीम जयपुरी

गो तही-दामन हूँ लेकिन ग़म नहीं

शमीम जयपुरी

बे-गुनाही का हर एहसास मिटा दे कोई

शमीम जयपुरी

चाहा बयाँ करूँ जों है मेरे ख़याल में

शमीम हाश्मी

तुम्हारे चाक पर ऐ कूज़ा-गर लगता है डर हम को

शमीम हनफ़ी

तिलिस्म है कि तमाशा है काएनात उस की

शमीम हनफ़ी

परछाइयों की बात न कर रंग-ए-हाल देख

शमीम हनफ़ी

किताब पढ़ते रहे और उदास होते रहे

शमीम हनफ़ी

बंद कर के खिड़कियाँ यूँ रात को बाहर न देख

शमीम हनफ़ी

याद आती है अच्छी सी कोई बात सर-ए-शाम

शमीम अब्बास

वो एक शख़्स मिरे पास जो रहा भी नहीं

शमीम अब्बास

तुम में तो कुछ भी वाहियात नहीं

शमीम अब्बास

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