बात Poetry (page 23)
छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी
शाज़ तमकनत
ज़ख़्म सीने का फिर उभर आया
शायान क़ुरैशी
ज़बानें चुप रहें लेकिन मिज़ाज-ए-यार बोलेगा
शायान क़ुरैशी
शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है
शायान क़ुरैशी
राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है
शायान क़ुरैशी
बात हो दैर-ओ-हरम की या वतन की बात हो
शायान क़ुरैशी
जफ़ा पे शुक्र का उम्मीद-वार क्यूँ आया
शौक़ क़िदवाई
फ़रियाद और तुझ को सितमगर कहे बग़ैर
शौक़ क़िदवाई
नहीं ज़माने में हासिल कहीं ठिकाना मुझे
शौक़ जालंधरी
महव-ए-नग़्मा मिरा क़ातिल जो रहा करता है
शौक़ बहराइची
ज़िंदगी से कोई मानूस तो हो ले पहले
शौकत परदेसी
क्या बढ़ेगा वो तसव्वुर की हदों से आगे
शौकत परदेसी
किसी की बाज़ी कैसी घात
शौकत परदेसी
जी में आता है कि 'शौकत' किसी चिंगारी को
शौकत परदेसी
जब मस्लहत-ए-वक़्त से गर्दन को झुका कर
शौकत परदेसी
अपने पराए थक गए कह कर हर कोशिश बेकार रही
शौकत परदेसी
औरत
शौकत परदेसी
शुऊ'र-ए-कैफ़-ओ-ख़ुशी है ज़रा ठहर जाओ
शौकत परदेसी
ग़म की अँधेरी राहों में तो तुम भी नहीं काम आओ हो
शौकत परदेसी
मौत का फ़रिश्ता
शौकत आबिदी
वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता
शारिक़ कैफ़ी
बहुत भटके तो हम समझे हैं ये बात
शारिक़ कैफ़ी
वो बकरा फिर अकेला पड़ गया है
शारिक़ कैफ़ी
मरने वाले से जलन
शारिक़ कैफ़ी
ख़ाक को मैं ख़्वार क्यूँ करता
शारिक़ कैफ़ी
जन्नत से दूर
शारिक़ कैफ़ी
जनाज़े में तो आओगे न मेरे
शारिक़ कैफ़ी
इबादत के वक़्त में हिस्सा
शारिक़ कैफ़ी
एक कैंसर के मरीज़ की बड़-बड़
शारिक़ कैफ़ी
ये सच है दुनिया बहुत हसीं है
शारिक़ कैफ़ी
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