बात Poetry (page 31)

वफ़ा का शौक़ ये किस इंतिहा में ले आया

शहबाज़ ख़्वाजा

किसी ने देख लिया था जो साथ चलते हुए

शहबाज़ ख़्वाजा

कड़े हैं हिज्र के लम्हात उस से कह देना

शहबाज़ ख़्वाजा

उफ़क़ पे

शहाब सर्मदी

सूरज का शहर

शहाब जाफ़री

जो मैं ने सोचा था

शहाब अख़्तर

तलब में बोसे की क्या है हुज्जत सवाल दीगर जवाब दीगर

शाह नसीर

शब जो रुख़-ए-पुर-ख़ाल से वो बुर्के को उतारे सोते हैं

शाह नसीर

न दिखाइयो हिज्र का दर्द-ओ-अलम तुझे देता हूँ चर्ख़-ए-ख़ुदा की क़सम

शाह नसीर

लगा जब अक्स-ए-अबरू देखने दिलदार पानी में

शाह नसीर

जिस्म उस के ग़म में ज़र्द-अज़-ना-तवानी हो गया

शाह नसीर

क़फ़स में रह के गुल-ओ-नस्तरन की बात करो

शाग़िल क़ादरी

जो ब-ईं ग़म भी शादमाँ गुज़री

शफ़क़त काज़मी

हमारे हाल पे किस दिन जफ़ा नहीं करते

शफ़क़त काज़मी

तेज़ आँधी ने फ़क़त इक साएबाँ रहने दिया

शफ़ीक़ सलीमी

ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है शाह की मुख़्बर लगी हुई

शफ़ीक़ सलीमी

यूँ तसव्वुर में बसर रात किया करते थे

शफ़ीक़ जौनपुरी

ज़िंदगी तुझ से हमें अब कोई शिकवा ही नहीं

शफ़ीक़ देहलवी

इक कार-ए-गराँ है खेल नहीं

शफ़ीक़ देहलवी

ज़बाँ ख़मोश रहे तर्क-ए-मुद्दआ न करे

शायर फतहपुरी

जो कैफ़-ए-इश्क़ से ख़ाली हो ज़िंदगी किया है

शायर फतहपुरी

गुल-ए-ख़ुश-नुमा के लिबास में कि शुआ-ए-नूर में ढल के आ

शायर फतहपुरी

फ़साना-ए-सितम-ए-काएनात कहते हैं

शायर फतहपुरी

लिल्लाह कोई कोशिश न करे उल्फ़त में मुझे समझाने की

शादाँ इंदौरी

अब ज़मीन-ओ-आसमाँ के सब किनारों से अलग

शादाब उल्फ़त

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ

शाद लखनवी

क्या कहूँ ग़ुंचा-ए-गुल नीम-दहाँ है कुछ और

शाद लखनवी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

दिल की कहूँ या कहूँ जिगर की

शाद लखनवी

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