बात Poetry (page 30)

मेज़ पे चेहरा ज़ुल्फ़ें काग़ज़ पर

शहनवाज़ ज़ैदी

वफ़ा-परस्त जहान-ए-वफ़ा को ले डूबे

शाहजहाँ बानो याद

सलीक़ा इश्क़ में मेरा बड़े कमाल का था

शाहिदा हसन

कोई सर्द हवा लब-ए-बाम चली

शाहिदा हसन

ज़िंदगी मेरी हुई है फिर निढाल

शाहिद नईम

सब हैं मसरूफ़ किसी को यहाँ फ़ुर्सत नहीं है

शाहिद कमाल

हमें ख़बर भी नहीं यार खींचता है कोई

शाहिद कमाल

दश्त-ए-वहशत को फिर आबाद करूँगा इक दिन

शाहिद कमाल

ऐ ज़ौक़ अर्ज़-ए-हुनर हर्फ़-ए-ए'तिदाल में रख

शाहिद कमाल

मय-ख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझ से

शाहिद कबीर

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी

शाहिद कबीर

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

पहाड़ होने का सारा ग़ुरूर काँप उठा

शाहिद जमाल

कुछ अपनी बात कहो कुछ मिरी सुनो मत सो

शाहिद इश्क़ी

मुज़्तरिब सा रहता है मुझ से बात करते वक़्त

शाहिद फ़रीद

बाज़ार

शाहिद अख़्तर

किसी की ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन की बात हुई

शाहिद अख़्तर

आप के इज़्न-ए-मुलाक़ात से जी डरता है

शाहिद अख़्तर

दम अजनबी सदाओं का भरते हो साहिबो

शाहिद अहमद शोएब

ज़रूरत क्या है

शाहीन मुफ़्ती

थी कुछ न ख़ता फिर भी पशेमान रहे हैं

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

नक़्श करता रम-ओ-रफ़्तार इनाँ-गीर को मैं

शाहीन अब्बास

मैं हुआ तेरा माजरा तू मिरा माजरा हुआ

शाहीन अब्बास

कैसा कैसा दर पस-ए-दीवार करना पड़ गया

शाहीन अब्बास

झगड़े अपने भी हों जब चाक-गरेबानों के

शाहीन अब्बास

जारी थी अभी दुआ हमारी

शाहीन अब्बास

गुज़रे नहीं और गुज़र गए हम

शाहीन अब्बास

किसी ने देख लिया था जो साथ चलते हुए

शहबाज़ ख़्वाजा

ज़िंदगी शब के जज़ीरों से उधर ढूँडते हैं

शहबाज़ ख़्वाजा

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