बात Poetry (page 29)

कहने को तो हर बात कही तेरे मुक़ाबिल

शहरयार

हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की

शहरयार

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है

शहरयार

ज़वाल की हद

शहरयार

नए अहद का नया सवाल

शहरयार

फ़रार

शहरयार

ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो' थी नहीं कुछ कम है

शहरयार

ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें

शहरयार

तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें

शहरयार

तू कहाँ है तुझ से इक निस्बत थी मेरी ज़ात को

शहरयार

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है

शहरयार

मिशअल-ए-दर्द फिर एक बार जला ली जाए

शहरयार

कहने को तो हर बात कही तेरे मुक़ाबिल

शहरयार

जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने

शहरयार

जुदा हुए वो लोग कि जिन को साथ में आना था

शहरयार

जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है

शहरयार

गुज़रे थे हुसैन इब्न-ए-अली रात इधर से

शहरयार

दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे

शहरयार

देख दरिया को कि तुग़्यानी में है

शहरयार

बुनियाद-ए-जहाँ में कजी क्यूँ है

शहरयार

बे-ताब हैं और इश्क़ का दावा नहीं हम को

शहरयार

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

शहरयार

आहट जो सुनाई दी है हिज्र की शब की है

शहरयार

वो बात

शहराम सर्मदी

तो क्या तड़प न थी अब के मिरे पुकारे में

शहराम सर्मदी

समुंदर तिश्नगी वहशत रसाई चश्मा-ए-लब तक

शहराम सर्मदी

मिरे सुख़न पे इक एहसान अब के साल तो कर

शहराम सर्मदी

हम अपने इश्क़ की बाबत कुछ एहतिमाल में हैं

शहराम सर्मदी

हमारे ज़ेहन में ये बात भी नहीं आई

शहराम सर्मदी

ग़म मुझ से किसी तौर समेटा नहीं जाता

शहनाज़ मुज़म्मिल

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