बात Poetry (page 28)

शिकस्ता छत में परिंदों को जब ठिकाना मिला

शहज़ाद नय्यर

न पूछ मेरी कहानी कहाँ से निकली है

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

ये और बात इसे ज़िंदगी न कह पाएँ

शहज़ाद अहमद

ये अलग बात ज़बाँ साथ न दे पाएगी

शहज़ाद अहमद

शुमार मैं न करूँगा फ़िराक़ के शब ओ रोज़

शहज़ाद अहमद

जहाँ में हम ने किसी से भी खुल के बात न की

शहज़ाद अहमद

अजब नहीं कि इसी बात पर लड़ाई हो

शहज़ाद अहमद

ये न हो वो भूलने वाला भुला देना पड़े

शहज़ाद अहमद

ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से

शहज़ाद अहमद

वाक़िआ कोई न जन्नत में हुआ मेरे ब'अद

शहज़ाद अहमद

शहर का शहर अगर आए भी समझाने को

शहज़ाद अहमद

न सही कुछ मगर इतना तो किया करते थे

शहज़ाद अहमद

मैं जो रोता हूँ तो कहते हो कि ऐसा न करो

शहज़ाद अहमद

खिले जो फूल तो मुँह छुप गया सितारों का

शहज़ाद अहमद

कब तक कड़कती धूप में आँखें जलाएँ हम

शहज़ाद अहमद

जब आफ़्ताब न निकला तो रौशनी के लिए

शहज़ाद अहमद

इस दौर-ए-बे-दिली में कोई बात कैसे हो

शहज़ाद अहमद

इस भरे शहर में आराम मैं कैसे पाऊँ

शहज़ाद अहमद

इबलीस भी रख लेते हैं जब नाम फ़रिश्ते

शहज़ाद अहमद

हम लोगों को अपने दिल के राज़ बताते रहते हैं

शहज़ाद अहमद

फ़स्ल-ए-गुल ख़ाक हुई जब तो सदा दी तू ने

शहज़ाद अहमद

दिल ओ दिमाग़ में एहसास-ए-ग़म उभार दिया

शहज़ाद अहमद

दिल का बुरा नहीं मगर शख़्स अजीब ढब का है

शहज़ाद अहमद

चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया

शहज़ाद अहमद

अक़्ल हर बात पे हैराँ है इसे क्या कहिए

शहज़ाद अहमद

अब न वो शोर न वो शोर मचाने वाले

शहज़ाद अहमद

तुझ से मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी

शहरयार

तुझे भूल गया कभी याद नहीं करता तुझ को

शहरयार

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में

शहरयार

कौन सी बात है जो उस में नहीं

शहरयार

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