बात Poetry (page 32)

निहायत इंकिसारी आजिज़ी से बात करते हैं

शाद बिलगवी

छुप-छुप के तू 'शाद' उस से मुलाक़ात करे है

शाद बिलगवी

कौन सी बात नई ऐ दिल-ए-नाकाम हुई

शाद अज़ीमाबादी

ये रात भयानक हिज्र की है काटेंगे बड़े आलाम से हम

शाद अज़ीमाबादी

न जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्ताक़ों का मेला था

शाद अज़ीमाबादी

ये सिलसिले भी रिफ़ाक़त के कुछ अजीब से हैं

शबनम शकील

हाथ न आई दुनिया भी और इश्क़ में भी गुमनाम रहे

शबनम शकील

हर रोज़ राह तकती हैं मेरे सिंघार की

शबनम शकील

गए बरस की यही बात यादगार रही

शबनम शकील

बदल चुकी है हर इक याद अपनी सूरत भी

शबनम शकील

अक्सर अपने दर-पए-आज़ार हो जाते हैं हम

शबनम शकील

अब मुझ को रुख़्सत होना है कुछ मेरा हार-सिंघार करो

शबनम शकील

अब मुझ को क्या ख़बर वो यहाँ है भी या नहीं

शबनम शकील

आईन-ए-वफ़ा इतना भी सादा नहीं होता

शबनम शकील

नज़्म

शबनम अशाई

शब-ए-विसाल थी रौशन फ़ज़ा में बैठा था

शबाब ललित

कभी भूल कर भी न बात की मुझे दिल से ऐसा भुला दिया

शबाब

हवा को और भी कुछ तेज़ कर गए हैं लोग

शायर लखनवी

वो मज़ा रखते हैं कुछ ताज़ा फ़साने अपने

शानुल हक़ हक़्क़ी

समझ में ख़ाक ये जादूगरी नहीं आती

शानुल हक़ हक़्क़ी

ईमा-ए-ग़ज़ल करती हैं मौसम की अदाएँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

फ़ित्ने जो कई शक्ल-ए-करिश्मात उठे हैं

शानुल हक़ हक़्क़ी

असर न हो तो उसी नुत्क़-ए-बे-असर से कह

शानुल हक़ हक़्क़ी

मुद्दत से ढूँडती है किसी की नज़र मुझे

शाद अमृतसरी

ज़ब्त-ए-नावक-ए-ग़म से बात बन तो सकती है

शाद आरफ़ी

उठ गई उस की नज़र मैं जो मुक़ाबिल से उठा

शाद आरफ़ी

सितम-गर को मैं चारा-गर कह रहा हूँ

शाद आरफ़ी

क़दम सँभल के बढ़ाओ कि रौशनी कम है

शाद आरफ़ी

मुस्तक़बिल रौशन-तर कहिए

शाद आरफ़ी

हुदूद-ए-अक्ल-ओ-शर्ब का सवाल ही नहीं रहा

शाद आरफ़ी

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