बात Poetry (page 50)

दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ

राजेश रेड्डी

क्या आज उन से अपनी मुलाक़ात हो गई

राजेन्द्र नाथ रहबर

जब शाम जन्नत में हुई

राजा मेहदी अली ख़ाँ

अदीब की महबूबा

राजा मेहदी अली ख़ाँ

मैं संगलाख़ ज़मीनों के राज़ कहता हूँ

राज नारायण राज़

क्या बात थी कि जो भी सुना अन-सुना हुआ

राज नारायण राज़

क्या बात है कि बात ही दिल की अदा न हो

राज नारायण राज़

बूँदें पड़ी थीं छत पे कि सब लोग उठ गए

राज नारायण राज़

अशआर रंग रूप से महरूम क्या हुए

राज नारायण राज़

हिसार-ए-ज़ात से निकलूँ तो तुझ से बात करूँ

राज कुमार क़ैस

तिरे सुलूक का ग़म सुब्ह-ओ-शाम क्या करते

रईस सिद्दीक़ी

तिरे सुलूक का ग़म सुब्ह-ओ-शाम क्या करते

रईस सिद्दीक़ी

खोने की बात और न पाने की बात है

रईस सिद्दीक़ी

सच्चाई

रईस फ़रोग़

सड़कों पे घूमने को निकलते हैं शाम से

रईस फ़रोग़

फूल ज़मीन पर गिरा फिर मुझे नींद आ गई

रईस फ़रोग़

किसी किसी की तरफ़ देखता तो मैं भी हूँ

रईस फ़रोग़

हाथ हमारे सब से ऊँचे हाथों ही से गिला भी है

रईस फ़रोग़

घर मुझे रात भर डराए गया

रईस फ़रोग़

आँखों के कश्कोल शिकस्ता हो जाएँगे शाम को

रईस फ़रोग़

आँखें जिन को देख न पाएँ सपनों में बिखरा देना

रईस फ़रोग़

सफ़र में कोई रुकावट नहीं गदा के लिए

रईस अमरोहवी

राज़-ए-गिरफ़्तगी न असीर-ए-लहन से पूछ

रईस अमरोहवी

बुलंद-ओ-पस्त में मंज़िल हमें कहीं न मिली

रईस अमरोहवी

अब दिल की ये शक्ल हो गई है

रईस अमरोहवी

क्यूँ न हम याद किसी को सहर-ओ-शाम करें

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी मैं ने

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

दब गईं मौजें यकायक जोश में आने के बा'द

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

'मीर' की सादगी बयान में रख

रहमत अमरोहवी

उम्मीद

राही मासूम रज़ा

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