बात Poetry (page 49)

हर इक छोटी से छोटी बात पर नादाँ निकलती है

रजनीश सचन

वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्न-ए-आख़िर था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ऐ दोस्त मैं ख़ामोश किसी डर से नहीं था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

कोई ख़्वाब ख़्वाब सा फ़ासला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

आख़िरी बस

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ये ज़रा सा कुछ और एक-दम बे-हिसाब सा कुछ

राजेन्द्र मनचंदा बानी

वो बात बात पे जी भर के बोलने वाला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

तुझे ज़रा दुख और सिसकने वाला मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

तीरगी बला की है मैं कोई सदा लगाऊँ

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सदा-ए-दिल इबादत की तरह थी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या

राजेन्द्र मनचंदा बानी

न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मैं उस की बात की तरदीद करने वाला था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मैं चुप खड़ा था तअल्लुक़ में इख़्तिसार जो था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ख़ाक ओ ख़ूँ की वुसअतों से बा-ख़बर करती हुई

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हम हैं मंज़र सियह आसमानों का है

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हमें लपकती हवा पर सवार ले आई

राजेन्द्र मनचंदा बानी

घनी-घनेरी रात में डरने वाला मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

देखता था मैं पलट कर हर आन

राजेन्द्र मनचंदा बानी

चमकती आँख में सहरा दिखाई साफ़ देता है

राजेन्द्र मनचंदा बानी

बहुत कुछ मुंतज़िर इक बात का था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

अजीब तजरबा था भीड़ से गुज़रने का

राजेन्द्र मनचंदा बानी

आज इक लहर भी पानी में न थी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

यूँ हसरतों के दाग़ मोहब्बत में धो लिए

राजेन्द्र कृष्ण

वो दिल से कम ज़बाँ ही से ज़ियादा बात करता था

राजेश रेड्डी

सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया

राजेश रेड्डी

जिस को भी देखो तिरे दर का पता पूछता है

राजेश रेड्डी

इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़ियादा थी

राजेश रेड्डी

घर से निकले थे हौसला कर के

राजेश रेड्डी

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