बात Poetry (page 47)

फ़र्क़ कोई नहीं मगर है भी!

राशिद मुफ़्ती

दुनिया में है यूँ तो कौन बे-ग़म

राशिद मुफ़्ती

अब क्या गिला कि रूह को खिलने नहीं दिया

राशिद मुफ़्ती

मैं दश्त-ए-शेर में यूँ राएगाँ तो होता रहा

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

इस तग-ओ-दौ ने आख़िरश मुझ को निढाल कर दिया

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

मुजरिम है तुम्हारा तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

राशिद फ़ज़ली

तेरी आवाज़

राशिद अनवर राशिद

ये न सोचा था कड़ी धूप से रिश्ता भी तो है

राशिद अनवर राशिद

नज़र से दूर रहे मुझ को आज़माए भी

राशिद अनवर राशिद

मुसाहिबत का कोई सिलसिला नहीं है क्या

राशिद अनवर राशिद

बहुत उदास है माह-ए-तमाम किस के लिए

राशिद अनवर राशिद

तुम अपनी आँखों को बंद कर लो

राशिद आज़र

ज़िंदगी जो कह न पाई रह गई

राशिद आज़र

वही तअल्लुक़-ए-ख़ातिर जो बर्क़-ओ-बाद में है

राशिद आज़र

टूट जाए तो कहीं उस को भी चैन आता है

रशीदा सलीम सीमीं

आँख इम्कान से भरी हुई थी

राशिदा माहीन मलिक

अगरचे मैं ने लिखीं उस को अर्ज़ियाँ भी बहुत

रशीद उस्मानी

तर्क-ए-सितम पे वो जो क़सम खा के रह गए

रशीद रामपुरी

मुफ़्त दुश्नाम-ए-यार सुनते हैं

रशीद रामपुरी

मिरे घर के लोग जो घर मुझी को सुपुर्द कर के चले गए

रशीद रामपुरी

मिरा नाम क़ैस क्यूँ कर तिरे नाम तक न पहुँचे

रशीद रामपुरी

कहते हो मुझे बे-अदब ख़ैर मैं बे-अदब सही

रशीद रामपुरी

जब नज़र उस ने मिलाई होगी

रशीद रामपुरी

ये कौन सा सूरज मिरे पहलू में खड़ा है

रशीद क़ैसरानी

सहरा सहरा बात चली है नगरी नगरी चर्चा है

रशीद क़ैसरानी

दीप से दीप जलाओ तो कोई बात बने

रशीद क़ैसरानी

दरियाओं का सहराओं में बहना मिरा क़िस्सा

रशीद क़ैसरानी

बात सूरज की कोई आज बनी है कि नहीं

रशीद क़ैसरानी

नहीं था ज़ख़्म तो आँसू कोई सजा लेता

रशीद निसार

जो मुझे मर्ग़ूब हो वो सोगवारी चाहिए

रशीद लखनवी

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