बात Poetry (page 51)

तल्ख़-ओ-तुर्श

राही मासूम रज़ा

तआरुफ़

राही मासूम रज़ा

चाँद और चकोर

राही मासूम रज़ा

दिलों की राह पर आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है

राही मासूम रज़ा

मता-ओ-माल-ए-हवस हुब्ब-ए-आल सामने है

राही फ़िदाई

साक़ी भले फटकने न दे पास जाम के

राहील फ़ारूक़

हर एक शक्ल में सूरत नई मलाल की है

इरफ़ान सत्तार

हमें नहीं आते ये कर्तब नए ज़माने वाले

इरफ़ान सत्तार

ग़मों में कुछ कमी या कुछ इज़ाफ़ा कर रहे हैं

इरफ़ान सत्तार

अब आ भी जाओ, बहुत दिन हुए मिले हुए भी

इरफ़ान सत्तार

हम उस के सामने हुस्न-ओ-जमाल क्या रखते

इरम ज़ेहरा

अपने ग़रीब दिल की बात करते हैं राएगाँ कहाँ

इरम लखनवी

इसी सबब से तो हम लोग पेश-ओ-पस में हैं

इक़बाल उमर

हर बात जो न होना थी ऐसी हुई कि बस

इक़बाल उमर

अब इलाज-ए-दिल-ए-बीमार-ए-सहर हो कि न हो

इक़बाल उमर

वो मुसलसल चुप है तेरे सामने तन्हाई में

इक़बाल साजिद

साए की तरह बढ़ न कभी क़द से ज़ियादा

इक़बाल साजिद

ख़ौफ़ दिल में न तिरे दर के गदा ने रक्खा

इक़बाल साजिद

अस्बाब यही है यही सामान हमारा

इक़बाल पयाम

नगर में रहते थे लेकिन घरों से दूर रहे

इक़बाल मिनहास

सुना है उस ने ख़िज़ाँ को बहार करना है

इक़बाल कैफ़ी

बारहा उन से न मिलने की क़सम खाता हूँ मैं

इक़बाल अज़ीम

ज़हर के घूँट भी हँस हँस के पिए जाते हैं

इक़बाल अज़ीम

ज़ब्त भी चाहिए ज़र्फ़ भी चाहिए और मोहतात पास-ए-वफ़ा चाहिए

इक़बाल अज़ीम

तुम ग़ैरों से हँस हँस के मुलाक़ात करो हो

इक़बाल अज़ीम

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते

इक़बाल अज़ीम

बिल-एहतिमाम ज़ुल्म की तज्दीद की गई

इक़बाल अज़ीम

अपना घर छोड़ के हम लोग वहाँ तक पहुँचे

इक़बाल अज़ीम

कोई अच्छा लगे कितना ही भरोसा न करो

इक़बाल अासिफ़

ख़िज़ाँ का क़र्ज़ तो इक इक दरख़्त पर है यहाँ

इक़बाल अशहर कुरेशी

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