बात Poetry (page 8)

इन की नज़रों में न बन जाए तमाशा चेहरा

ज़फ़र अंसारी ज़फ़र

हर इक शय इश्तिहारी हो गई है

ज़फ़र अंसारी ज़फ़र

ग़म इतने अपने दामन-ए-दिल से लिपट गए

ज़फ़र अंसारी ज़फ़र

सुख़नवरान-ए-अहद से ख़िताब

ज़फ़र अली ख़ाँ

ये अलग बात कि वो दिल से किसी और का था

ज़फ़र अज्मी

तू ने क्यूँ हम से तवक़्क़ो न मुसाफ़िर रक्खी

ज़फ़र अज्मी

जिस का बदन है ख़ुश्बू जैसा जिस की चाल सबा सी है

यूसुफ़ ज़फ़र

हम गरचे दिल ओ जान से बेज़ार हुए हैं

यूसुफ़ ज़फ़र

ख़ुद-फ़रेबी

यूसुफ़ तक़ी

दिल में जब कभी तेरी याद सो गई होगी

यूसुफ़ तक़ी

सोचा कि वा हो सब्ज़ दरीचा जो बंद था

युसूफ़ जमाल

सिमटे रहे तो दर्द की तन्हाइयाँ मिलीं

यूसुफ़ आज़मी

तुम्हारी जुस्तुजू की है वहाँ तक

यूनुस ग़ाज़ी

कहिए किन लफ़्ज़ों में अश्कों की कहानी लिक्खूँ

यूनुस ग़ाज़ी

निगाह-ए-नाज़ का हासिल है ए'तिबार मुझे

यज़दानी जालंधरी

लबों तक आया ज़बाँ से मगर कहा न गया

यज़दानी जालंधरी

सहने को तो सह जाएँ ग़म-ए-कौन-ओ-मकाँ तक

यावर अब्बास

भीगी पलकें शौक़ का आलम वक़्त का धारा क्या नहीं देखा

यावर अब्बास

पर्दा आँखों से हटाने में बहुत देर लगी

यासमीन हामिद

मिरी हर बात पस-मंज़र से क्यूँ मंसूब होती है

यासमीन हमीद

मैं अब उस हर्फ़ से कतरा रही हूँ

यासमीन हमीद

उफ़ुक़ तक मेरा सहरा खिल रहा है

यासमीन हमीद

कोई पूछे मिरे महताब से मेरे सितारों से

यासमीन हमीद

हमें ख़बर थी बचाने का उस में यारा नहीं

यासमीन हमीद

इक बे-पनाह रात का तन्हा जवाब था

यासमीन हमीद

मुझ को उतार हर्फ़ में जान-ए-ग़ज़ल बना मुझे

यासमीन हबीब

कैसे हों ख़्वाब आँख में कैसा ख़याल दिल में हो

यासमीन हबीब

मुझ को उतार हर्फ़ में जान-ए-ग़ज़ल बना मुझे

यासमीन हबीब

किसी के साथ किया निस्बत हुई थी

यासमीन हबीब

जो चला गया सो चला गया जो है पास उस का ख़याल रख

यासमीन हबीब

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