बात Poetry (page 9)
जो नज़र किया मैं सिफ़ात में हुआ मुझ पे कब ये अयाँ नहीं
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
जहाँ बात वहदत की गहरी रहेगी
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
अयाँ हो आप बेगाना बनाया
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ख़्वाब ता'बीर में बदलता है
यशब तमन्ना
चाह थी मेहर थी मोहब्बत थी
यशब तमन्ना
ख़ून की एक नदी और बहेगी शायद
याक़ूब राही
हवा-ए-सुब्ह-ए-नुमू दुश्मन-ए-चमन कैसे
याक़ूब राही
मैं आज कल के तसव्वुर से शाद-काम तो हूँ
याक़ूब आमिर
चंद घंटे शोर ओ ग़ुल की ज़िंदगी चारों तरफ़
याक़ूब आमिर
अगरचे हाल ओ हवादिस की हुक्मरानी है
याक़ूब आमिर
यार कब दिल की जराहत पे नज़र करता है
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
आ रही है ये सदा कान में वीरानों से
यगाना चंगेज़ी
रौशन तमाम काबा ओ बुत-ख़ाना हो गया
यगाना चंगेज़ी
पाया है इस क़दर सुख़न-ए-सख़्त ने रिवाज
वज़ीर अली सबा लखनवी
अहवाल-ए-मज़ाहिब से ये साबित हुआ हम को
वज़ीर अली सबा लखनवी
आहिस्ता बात कर कि हवा तेज़ है बहुत
वज़ीर आग़ा
सारी उम्र गँवा दी हम ने
वज़ीर आग़ा
अब दिन की बातें करते हैं
वज़ीर आग़ा
आवेज़िश
वज़ीर आग़ा
ज़ेहन-ए-रसा की गिर्हें मगर खोलने लगे
वज़ीर आग़ा
सहर ने आ कर मुझे सुलाया तो मैं ने जाना
वज़ीर आग़ा
रंग और रूप से जो बाला है
वज़ीर आग़ा
न आँखें ही झपकता है न कोई बात करता है
वज़ीर आग़ा
ख़ुद से हुआ जुदा तो मिला मर्तबा तुझे
वज़ीर आग़ा
कितने भी ग़म-ज़दा हों मगर मुस्कुराएँगे
वासिफ़ यार
वो जिन की लौ से हज़ारों चराग़ जलते थे
वासिफ़ देहलवी
क़दम यूँ बे-ख़तर हो कर न मय-ख़ाने में रख देना
वासिफ़ देहलवी
इज़्ज़त उन्हें मिली वही आख़िर बड़े रहे
वासिफ़ देहलवी
बयाँ ऐ हम-नशीं ग़म की हिकायत और हो जाती
वासिफ़ देहलवी
तुम मिरी आँख के तेवर न भुला पाओगे
वसी शाह
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