बात Poetry (page 85)

मैं किनारे पे खड़ा हूँ तो कोई बात नहीं

बक़ा बलूच

गर्मी-ए-शिद्दत-ए-जज़्बात बता देता है

बक़ा बलूच

अब नहीं दर्द छुपाने का क़रीना मुझ में

बक़ा बलूच

गर मुझे मेरी ज़ात मिल जाए

बलवान सिंह आज़र

उसी के ज़ुल्म से मैं हालत-ए-पनाह में था

बख़्श लाइलपूरी

पड़े हैं राह में जो लोग बे-सबब कब से

बख़्श लाइलपूरी

शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही

ज़फ़र

निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ

ज़फ़र

न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है

ज़फ़र

हम ये तो नहीं कहते कि ग़म कह नहीं सकते

ज़फ़र

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

ज़फ़र

मैं भी गुम-सुम था कोई बात न करने पाया

बाग़ हुसैन कमाल

यास की कोहर में लिपटा हुआ चेहरा देखा

बाग़ हुसैन कमाल

ज़रूरतों की हमाहमी में जो राह चलते भी टोकती है वो शाइ'री है

बद्र-ए-आलम ख़लिश

वो जब देगा जो कुछ देगा देगा अपने वालों को

बद्र वास्ती

बुरा हो कर भी वो अच्छा बहुत है

बद्र वास्ती

आग ही काश लग गई होती

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

दास्तान-ए-ग़म तुझे बतलाएँ क्या

बाबर रहमान शाह

मेरी हर बात पे बे-बात ख़फ़ा होते हो

बीएस जैन जौहर

मेरी हर बात पे बे-बात ख़फ़ा होते हो

बीएस जैन जौहर

कैफ़ियत-ए-दिल-ए-हज़ीं हम से नहीं बयाँ हुई

बीएस जैन जौहर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

मो'तबर से रिश्तों का साएबान रहने दो

अज़रा नक़वी

कैसे कैसे स्वाँग रचाए हम ने दुनिया-दारी में

अज़रा नक़वी

प्यारा प्यारा घर अपना

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

अधूरा टुकड़ा

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

जो बात शर्त-ए-विसाल ठहरी वही है अब वज्ह-ए-बद-गुमानी

अज़्म बहज़ाद

तू बात नहीं सुनता यही हल है फिर इस का

अज़लान शाह

सफ़र के ब'अद भी सफ़र का एहतिमाम कर रहा हूँ मैं

अज़लान शाह

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