बदन Poetry (page 10)

तुझ तक गुज़र किसी का ऐ गुल-बदन न देखा

शऊर बलगिरामी

उस को न ख़याल आए तो हम मुँह से कहें क्या

शुजा ख़ावर

तभी आएगी लबों पर मिरे दिल की बात खुल के

शुजा ख़ावर

एहसास की दीवार गिरा दी है चला जा

शोज़ेब काशिर

ये एक साया ग़नीमत है रोक लो वर्ना

शोएब निज़ाम

सफ़र सराबों का बस आज कटने वाला है

शोएब निज़ाम

हवस के बीज बदन जब से दिल में बोने लगा

शोएब निज़ाम

गीली मिट्टी से बदन बनते हुए उम्र लगी

शमशाद शाद

क्या देखता है हाथ मिरा छोड़ दे तबीब

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे

ज़ौक़

आख़िर तुम्हारे इश्क़ में बर्बाद हो सके

शहज़ाद रज़ा लम्स

वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुए

शीन काफ़ निज़ाम

आज हर सम्त भागते हैं लोग

शीन काफ़ निज़ाम

वो कौन है जिस की वहशत पर सुनते हैं कि जंगल रोता है

शाज़ तमकनत

शिकन शिकन तिरी यादें हैं मेरे बिस्तर की

शाज़ तमकनत

शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है

शाज़ तमकनत

कोई तो आ के रुला दे कि हँस रहा हूँ मैं

शाज़ तमकनत

ख़्वार-ओ-रुसवा थे यहाँ अहल-ए-सुख़न पहले भी

शाज़ तमकनत

ज़बानें चुप रहें लेकिन मिज़ाज-ए-यार बोलेगा

शायान क़ुरैशी

वक़्त आख़िर ले गया वो शोख़ियाँ वो बाँकपन

शायान क़ुरैशी

बात फाँसी के दिन की नहीं

शारिक़ कैफ़ी

उतर रहा था समुंदर सराब के अंदर

शरीक़ अदील

हवा की राह-नुमाई पे शक नहीं रखते

शरीक़ अदील

जो आँसुओं की ज़बाँ को मियाँ समझने लगे

शारिब मौरान्वी

मन अरफ़ा नफ़्सहू

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

जो उतरा फिर न उभरा कह रहा है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

हर जल्वा-ए-हुस्न बे-वतन है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

दिन-भर की दौड़ रात के औहाम वसवसे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या

शम्स तबरेज़ी

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