बज़्म Poetry (page 13)

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

इश्क़ और इतना मोहज़्ज़ब छोड़ कर दीवाना-पन

सलीम अहमद

रद्द-ए-अमल

सलाम मछली शहरी

अवाम

सलाम मछली शहरी

थोड़ी देर ऐ साक़ी बज़्म में उजाला है

सलाम मछली शहरी

शगुफ़्ता बच्चों का चेहरा दिखाई देने लगे

सलाम मछली शहरी

मैं तो कहता हूँ तुम्ही दर्द के दरमाँ हो ज़रूर

सलाम मछली शहरी

इन ग़ज़ालान-ए-तरह-दार को कैसे छोड़ूँ

सलाम मछली शहरी

ग़म पर हैं तअ'ना-ज़न तो ख़ुशी भी निभाइए

सलाम मछली शहरी

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

फ़सील-ए-शहर को जब तक गिरा नहीं देंगे

सलाहुद्दीन नय्यर

इस तरफ़ बज़्म में हम थे वो थे

सख़ी लख़नवी

क़ासिद तिरे बार बार आए

सख़ी लख़नवी

इन को नफ़रत इसे क्या कहते हैं

सख़ी लख़नवी

वो माह-वश है ज़मीं पर नज़र झुकाए हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

उन से वो रस्म-ए-मुलाक़ात चली जाती है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तुझे मैं मिलूँ तो कहाँ मिलूँ मिरा तुझ से रब्त मुहाल है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तेरे शैदा भी हुए इश्क़-ए-तमाशा भी हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

इश्क़ तो सारी उम्र का इक पेशा निकला

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हाल-ए-दिल कुछ जो सर-ए-बज़्म कहा है मैं ने

सज्जाद बाक़र रिज़वी

बे-दिली वो है कि मरने की तमन्ना भी नहीं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

शब की ज़ुल्फ़ें सँवारता हुआ मैं

सज्जाद बलूच

वो पल ये घड़ी

साजिदा ज़ैदी

जज़्बा-ए-इश्क़ भी है गर्मी-ए-बाज़ार भी है

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

दयार-ए-दिल से किसी का गुज़र ज़रूरी था

साइम जी

शगुफ़्त-ए-गुंचा-ए-महताब कौन देखेगा

सैफ़ुद्दीन सैफ़

बड़े ख़तरे में है हुस्न-ए-गुलिस्ताँ हम न कहते थे

सैफ़ुद्दीन सैफ़

किस लुत्फ़ से महफ़िल में बिठाए गए हम लोग

सैफ़ बिजनोरी

कर के मसहूर मुझे चश्म-ए-करम से पहले

सैफ़ बिजनोरी

ऐ शम्अ' अहल-ए-बज़्म तो बैठे ही रह गए

साहिर सियालकोटी

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