बज़्म Poetry (page 12)

मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा

सीमाब अकबराबादी

ख़त्म इस तरह नज़ा-ए-हक़-ओ-बातिल हो जाए

सीमाब अकबराबादी

हुस्न के दिल में जगह पाते ही दीवाना बने

सीमाब अकबराबादी

जिगर के ख़ून से रौशन गो ये चराग़ रहा

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

महफ़िल-ए-दोस्त में गो सीना-फ़िगार आए हैं

सय्यद एहतिशाम हुसैन

है इश्क़ तो फिर असर भी होगा

सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़

एक रौज़न के अभी किरदार में हूँ मैं

सौरभ शेखर

मै-कशाँ रूह हमारी भी कभी शाद करो

मोहम्मद रफ़ी सौदा

यूँ देख मिरे दीदा-ए-पुर-आब की गर्दिश

मोहम्मद रफ़ी सौदा

ग़ुंचे से मुस्कुरा के उसे ज़ार कर चले

मोहम्मद रफ़ी सौदा

तुझ को मेरे क़ुर्ब में पा कर जलते हैं दीवाने लोग

सत्यपाल जाँबाज़

वक़्त के हाथों हिकायात-ए-अना भूल गए

सरवर आलम राज़

पाते रहे ये फ़ैज़ तिरी बे-रुख़ी से हम

सरताज आलम आबिदी

रौनक़-ए-बज़्म नहीं था कोई तुझ से पहले

सरफ़राज़ ख़ालिद

रह कर मकान में मिरे मेहमान जाइए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

नाला शब-ए-फ़िराक़ जो कोई निकल गया

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

न आसमान है साकित न दिल ठहरता है

साक़िब लखनवी

ग़श भी आया मिरी पुर्सिश को क़ज़ा भी आई

साक़िब लखनवी

सूद-ओ-ज़ियाँ के बाब में हारे घड़ी घड़ी

सलमान अंसारी

खींच भी लीजिए अच्छा तो है तस्वीर-ए-जुनूँ

सालिक लखनवी

जो तेरी बज़्म से उट्ठा वो इस तरह उट्ठा

सालिक लखनवी

हर बज़्म क्यूँ नुमाइश-ए-ज़ख़्म-ए-हुनर बने

सलीम शाहिद

सुब्ह-ए-सफ़र का राज़ किसी पर यहाँ न खोल

सलीम शाहिद

वो जो हम-रही का ग़ुरूर था वो सवाद-ए-राह में जल-बुझा

सलीम कौसर

कभी सितारे कभी कहकशाँ बुलाता है

सलीम कौसर

कभी मौसम साथ नहीं देते कभी बेल मुंडेर नहीं चढ़ती

सलीम कौसर

आँख के कुंज में इक दश्त-ए-तमन्ना ले कर

सलीम बेताब

दिल जो इस बज़्म में आता है तो जाता ही नहीं

सलीम अहमद

बुरा लगा मिरे साक़ी को ज़िक्र-ए-तिश्ना-लबी

सलीम अहमद

किन नक़ाबों में है मस्तूर वो हुस्न-ए-मा'सूम

सलीम अहमद

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