बज़्म Poetry (page 10)

कोई है सुर्ख़-पोश कोई ज़र्द-पोश है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दौरा है जब से बज़्म में तेरी शराब का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

वहशत से हर सुख़न मिरा गोया ग़ज़ाला है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मैं अपने दस्त पर शब ख़्वाब में देखा कि अख़गर था

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क्या हुआ गर शैख़ यारो हाजी-उल-हरमैन है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

गुल की और बुलबुल की सोहबत को चमन का शाना है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दौरा है जब से बज़्म में तेरी शराब का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कल बज़्म में सब पर निगह-ए-लुतफ़-ओ-करम थी

शैख़ मोहम्मद रोशन जोशिश लखनवी

याँ मुद्दई' अपना किसे ऐ यार न देखा

शैख़ मोहम्मद रोशन जोशिश लखनवी

रदीफ़ क़ाफ़िया बंदिश ख़याल लफ़्ज़-गरी

शहज़ाद क़ैस

ज़रा लबों के तबस्सुम से बज़्म गर्माएँ

शहज़ाद अहमद

तुम्हारी बज़्म से भी उठ चले हैं दीवाने

शहज़ाद अहमद

कुछ तज़किरा-ए-हुस्न से रौशन थे दर-ओ-बाम

शहज़ाद अहमद

बस यही होगा कि दीवाना कहेंगे अहल-ए-बज़्म

शहज़ाद अहमद

यूँ ख़ाक की मानिंद न राहों पे बिखर जा

शहज़ाद अहमद

मैं जो रोता हूँ तो कहते हो कि ऐसा न करो

शहज़ाद अहमद

कितनी बे-नूर थी दिन भर नज़र-ए-परवाना

शहज़ाद अहमद

ख़ुद ही मिल बैठे हो ये कैसी शनासाई हुई

शहज़ाद अहमद

दिल ओ दिमाग़ में एहसास-ए-ग़म उभार दिया

शहज़ाद अहमद

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

शहज़ाद अहमद

एक काली नज़्म

शहरयार

ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें

शहरयार

वो बेवफ़ा है हमेशा ही दिल दुखाता है

शहरयार

शहर-ए-जुनूँ में कल तलक जो भी था सब बदल गया

शहरयार

हवा का ज़ोर ही काफ़ी बहाना होता है

शहरयार

दयार-ए-दिल न रहा बज़्म-ए-दोस्ताँ न रही

शहरयार

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

शहरयार

नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ उस की ख़ातिर रहन-ए-जाम करो

शाहिद इश्क़ी

अपने हमराह मोहब्बत के हवाले रखना

शाहिद फ़रीद

यूँ तो इस बज़्म में अपने भी हैं बेगाने भी

शाहिद अख़्तर

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