चाँद Poetry (page 15)

असीर-ए-शाम हैं ढलते दिखाई देते हैं

साबिर वसीम

तेरी याद मेरी भूल

साबिर दत्त

ख़्वाबों से न जाओ कि अभी रात बहुत है

साबिर दत्त

वो और होंगे नुफ़ूस बे-दिल जो कहकशाएँ शुमारते हैं

साबिर

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

आहिस्ता बोलिएगा तमाशा खड़ा न हो

साबिर

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

ये किस हसीन ने लोगों को रोक रक्खा है

रूही कंजाही

मोजज़ा कोई दिखाऊँ भी तो क्या

रूही कंजाही

अज़ीज़ इतना तिरा रंग-ओ-बू लगे है मुझे

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

न तारे अफ़्शाँ न कहकशाँ है नमूना हँसती हुई जबीं का

रियाज़ ख़ैराबादी

मेरे पहलू में हमेशा रही सूरत अच्छी

रियाज़ ख़ैराबादी

कोई मुँह चूम लेगा इस नहीं पर

रियाज़ ख़ैराबादी

गुलों के पर्दे में शक्लें हैं मह-जबीनों की

रियाज़ ख़ैराबादी

बाला-ए-बाम ग़ैर है में आस्तान पर

रियाज़ ख़ैराबादी

आरज़ू भी तो कर नहीं आती

रियाज़ ख़ैराबादी

नहीं क़ौल से फ़ेल तेरे मुताबिक़

रिन्द लखनवी

तजस्सुस

रिफ़अत सरोश

चाँद वीरान है सदियों से मिरे दिल की तरह

रिफ़अत सरोश

दर्द ग़ज़ल में ढलने से कतराता है

रियाज़ मजीद

उस चाँद को तुम दिल में छुपा क्यूँ नहीं लेते

रियाज़ हान्स

क्यूँ तिरे साथ रहीं उम्र बसर होने तक

रहमान फ़ारिस

शब-ओ-रोज़ रक़्स-ए-विसाल था सो नहीं रहा

रेहाना रूही

और कितने अभी सितम होंगे

रज़ी रज़ीउद्दीन

ये वक़्त जब भी लहू का ख़िराज माँगता है

रज़ा मौरान्वी

सहरा-ए-ख़याल का दिया हूँ

रज़ा हमदानी

हर अक्स ख़ुद एक आइना है

रज़ा हमदानी

पचास सालों में दो इक बरस का रिश्ता था

रज़ा अश्क

देख उफ़ुक़ के पीले-पन में दूर वो मंज़र डूब गया

रौनक़ रज़ा

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