चाँद Poetry (page 13)

तारे जो कभी अश्क-फ़िशानी से निकलते

सलीम कौसर

कोई याद ही रख़्त-ए-सफ़र ठहरे कोई राहगुज़र अनजानी हो

सलीम कौसर

वो चाँद टूट गया जिस से रात रौशन थी

सलीम फ़िगार

मशवरा

सलीम फ़िगार

खो दिए हैं चाँद कितने इक सितारा माँग कर

सलीम फ़िगार

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

उसे ख़ुद को बदल लेना गवारा भी नहीं होता

सलीम फ़राज़

इक एक लफ़्ज़ में कई पहलू कहाँ से आए

सलीम फ़राज़

आग सी बरसती है सब्ज़ सब्ज़ पत्तों से

सलीम बेताब

दिलों में दर्द भरता आँख में गौहर बनाता हूँ

सलीम अहमद

हमेशा दूर के जल्वे फ़रेब देते हैं

सलाम संदेलवी

ताबानी-ए-रुख़ ले कर तुम सामने जब आए

सलाम संदेलवी

बू-ए-गुल बाद-ए-सबा लाई बहुत देर के बा'द

सलाम संदेलवी

काश तुम समझ सकतीं ज़िंदगी में शाएर की ऐसे दिन भी आते हैं

सलाम मछली शहरी

जंगली नाच

सलाम मछली शहरी

थोड़ी देर ऐ साक़ी बज़्म में उजाला है

सलाम मछली शहरी

फूलों के देस चाँद सितारों के शहर में

सलाम मछली शहरी

काश तुम समझ सकतीं ज़िंदगी में शाएर की ऐसे दिन भी आते हैं

सलाम मछली शहरी

हम ऐसे लोग जल्द असीर-ए-ख़िज़ाँ हुए

सलाम मछली शहरी

ख़ाल और रुख़ से किस को दूँ निस्बत

सख़ी लख़नवी

बाम पर आता है हमारा चाँद

सख़ी लख़नवी

गो तिरे शहर में भी रात रहे

शख़ावत शमीम

ज़हर इन के हैं मिरे देखे हुए भाले हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

सोए हुओं में ख़्वाब से बेदार कौन है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ख़्वाहिश में सुकूँ की वही शोरिश-तलबी है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

इक दर्द सब के दर्द का मज़हर लगा मुझे

सज्जाद बाबर

तारे सारे रक़्स करेंगे चाँद ज़मीं पर उतरेगा

साजिद हाश्मी

मैं चाहता हूँ कि हर शय यहाँ सँवर जाए

साजिद हमीद

बर-सर-ए-दर्द ज़माने का भी सोचा जाए

साइम जी

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