चाँद Poetry (page 11)
मुझे ये ज़िद है कभी चाँद को असीर करूँ
शहबाज़ ख़्वाजा
सफ़र का एक नया सिलसिला बनाना है
शहबाज़ ख़्वाजा
तलाश
शहाब जाफ़री
सूरज का शहर
शहाब जाफ़री
कभू न उस रुख़-ए-रौशन पे छाइयाँ देखीं
शाह नसीर
अब ज़मीन-ओ-आसमाँ के सब किनारों से अलग
शादाब उल्फ़त
न जान कर गुल-ए-बाज़ी बहुत उछाल के फेंक
शाद लखनवी
ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं
शाद लखनवी
क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक
शाद अज़ीमाबादी
हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं
शबनम शकील
मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद
शबनम रूमानी
नज़्म
शबनम अशाई
मय-ए-फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था
शब्बीर शाहिद
मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा
सीमाब अकबराबादी
कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम
सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी
कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम
सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी
आँख के साहिल पर आते ही अश्क हमारे डूब गए
सय्यद ज़िया अल्वी
सफ़र-ब-ख़ैर प रख़्त-ए-सफ़र न ले जाना
सय्यद नसीर शाह
कोई भी लफ़्ज़-ए-इबरत-आश्ना मैं पढ़ नहीं सकता
सय्यद नसीर शाह
घुट के रह जाऊँगा बे-एहसास ग़म-ख़्वारों के पेच
सय्यद नसीर शाह
इतनी सियाह-रात में इतनी सी रौशनी
सऊद उस्मानी
शाम से गहरा चाँद से उजला एक ख़याल
सऊद उस्मानी
आँखों में एक ख़्वाब पस-ए-ख़्वाब और है
सऊद उस्मानी
कहाँ कहाँ से निगह उस को ढूँड लाए है
सत्य नन्द जावा
ख़ला में लुढ़कती ज़मीन
सरवत ज़ेहरा
चाँद निकले न कहीं यार पुराने निकले
सरवर नेपाली
पूरे चाँद की सज धज है शहज़ादों वाली
सरवत हुसैन
जब शाम हुई मैं ने क़दम घर से निकाला
सरवत हुसैन
ग़फ़लतों का समर उठाता हूँ
सरफ़राज़ ज़ाहिद
न चाँद का न सितारों न आफ़्ताब का है
सरफ़राज़ ख़ालिद
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