चाँद Poetry (page 10)

जीने मरने के दरमियान एक साअत

शहज़ाद अहमद

मुंतज़िर दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ है कि आहू आए

शहज़ाद अहमद

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

गर्दिश-ए-वक़्त का कितना बड़ा एहसाँ है कि आज

शहरयार

सैगंधी

शहरयार

साए

शहरयार

अब के बरस

शहरयार

ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें

शहरयार

तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें

शहरयार

निकला है चाँद शब की पज़ीराई के लिए

शहरयार

रगों में रात से ये ख़ून सा रवाँ है क्या

शहराम सर्मदी

निशात-उस्सानिया

शहनाज़ नबी

सूरज तिरी दहलीज़ में अटका हुआ निकला

शहनवाज़ ज़ैदी

हवा पे चल रहा है चाँद राह-वार की तरह

शाहिदा हसन

अजीब लोग

शाहिद माहुली

रात ही के दामन में चाँद भी हैं तारे भी

शाहिद लतीफ़

लोग हैरान हैं हम क्यूँ ये किया करते हैं

शाहिद लतीफ़

इक अज़ाब होता है रोज़ जी का खोना भी

शाहिद लतीफ़

नन्हा सा दिया है कि तह-ए-आब है रौशन

शाहिद कमाल

इब्तिदा से मैं इंतिहा का हूँ

शाहिद कमाल

हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है

शाहिद कमाल

रूह को क़ैद किए जिस्म के हालों में रहे

शाहिद कबीर

क्या फ़र्ज़ है ये जिस्म के ज़िंदाँ में सज़ा दे

शाहिद कबीर

कैसे तोड़ी गई ये हद्द-ए-अदब पूछते हैं

शाहिद जमाल

एक तुम्हारे प्यार की ख़ातिर जग के दुख अपनाए थे

शाहिद इश्क़ी

चाँद माँगा न कभी हम ने सितारे माँगे

शाहिद अख़्तर

दिल के ज़ख़्मों की लवें और उभारो लोगो

शाहिद अहमद शोएब

यूँ उलझ कर रह गई है तार-ए-पैराहन में रात

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ग़ुंचा ग़ुंचा मौसम-ए-रंग-ए-अदा में क़ैद था

शाहीन बद्र

साअत-ए-आसूदगी देखे हुए अर्सा हुआ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

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