चाँद Poetry (page 8)
बुल-हवस में भी न था वो बुत भी हरजाई न था
सिद्दीक़ अफ़ग़ानी
सोए पानी के तले डूबे हुए पैकर लिखें
सिब्त अहमद
मसअले का हल न निकला देर तक
श्याम सुन्दर नंदा नूर
आप इधर आए उधर दीन और ईमान गए
शुजा ख़ावर
लोगों ने हम को शहर का क़ाज़ी बना दिया
शुजा ख़ावर
अपना ख़ालिक़ ख़ुद ही था मेरा ख़ुदा कोई न था
शोला हस्पानवी
हम शहर में इक शम्अ की ख़ातिर हुए बर्बाद
शोहरत बुख़ारी
तेरा चेहरा देख के हर शब सुब्ह दोबारा लिखती है
शोएब निज़ाम
जो तसव्वुर में है उस को कोई क्या रौशन करे
शोएब निज़ाम
हैबत-ए-हुस्न से अल्फ़ाज़ की हैरानी तक
शोएब निज़ाम
एक ज़र्रा भी न मिल पाएगा मेरा मुझ को
शोएब बिन अज़ीज़
नदी किनारे जो नग़्मा-सरा मलंग हुए
शेर अफ़ज़ल जाफ़री
मिरा घर तेरी मंज़िल गाह हो ऐसे कहाँ तालेअ'
ज़ौक़
मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला
ज़ौक़
वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुए
शीन काफ़ निज़ाम
शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है
शाज़ तमकनत
मिसाल-ए-शोला-ओ-शबनम रहा है आँखों में
शाज़ तमकनत
याद
शौकत परदेसी
ज़िंदगी का सफ़र ख़त्म होता रहा तुम मुझे दम-ब-दम याद आते रहे
शौकत परदेसी
तराना-ए-उर्दू
शातिर हकीमी
पहुँच गया था वो कुछ इतना रौशनी के क़रीब
शारिब मौरान्वी
लग़्ज़िश पा-ए-होश का हर्फ़-ए-जवाज़ ले के हम
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
दिनों से कैसे शबों में ढलते हैं दिन हमारे
शमशीर हैदर
किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या
शम्स तबरेज़ी
ये अर्ज़-ओ-समा क़ुलज़ुम-ओ-सहरा मुतहर्रिक
शम्स रम्ज़ी
मुश्तइ'ल हो गया वो ग़ुंचा-दहन दानिस्ता
शम्स रम्ज़ी
सब से पहले तो अर्ज़ मतला है
शमीम क़ासमी
फ़रेब-ए-नज़र
शमीम करहानी
फ़ुर्क़त की भयानक रातों को इस तरह गुज़ारा करता हूँ
शमीम जयपुरी
तीरगी चाँद को इनआम-ए-वफ़ा देती है
शमीम हनफ़ी
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