चंद्रमा Poetry (page 40)

खींच कर तलवार जब तर्क-ए-सितमगर रह गया

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

उन से तन्हाई में बात होती रही

अनवर शऊर

जल्वे दिखाए यार ने अपनी हरीम-ए-नाज़ में

अनवर सहारनपुरी

तलख़ाबा-ए-ग़म ख़ंदा-जबीं हो के पिए जा

अनवर साबरी

हर साँस में ख़ुद अपने न होने का गुमाँ था

अनवर साबरी

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

यूसुफ़-ए-हुस्न का हुस्न आप ख़रीदार रहा

अनवर देहलवी

नज़र आए क्या मुझ से फ़ानी की सूरत

अनवर देहलवी

न मैं समझा न आप आए कहीं से

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

है भी और फिर नज़र नहीं आती

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

नए दिनों के नए सहीफ़ों में ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नहीं है

अनवर अलीमी

दिमाग़ उन के तजस्सुस में जिस्म घर में रहा

अंजुम सिद्दीक़ी

खींचा हुआ है गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने मुझे

अंजुम सलीमी

अदू तो क्या ये फ़लक भी उसे सता न सका

अंजुम मानपुरी

ख़ाक का रिज़्क़ यहाँ हर कस-ओ-ना-कस निकला

अंजुम ख़लीक़

बड़ी फ़र्ज़-आश्ना है सबा करे ख़ूब काम हिसाब का

अंजुम इरफ़ानी

नक़ाब उल्टा है शम्ओं' ने सितारो तुम तो सो जाओ

अनीस कैफ़ी

देखा है किसी आहू-ए-ख़ुश-चश्म को उस ने

अनीस अशफ़ाक़

म'अरका जब छिड़ गया तो क्या हुआ हम से सुनो

अनीस अशफ़ाक़

कब इश्क़ में यारों की पज़ीराई हुई है

अनीस अशफ़ाक़

हुस्न के जल्वे नहीं मुहताज-ए-चश्म-ए-आरज़ू

आनंद नारायण मुल्ला

ज़िंदगी गो कुश्ता-ए-आलाम है

आनंद नारायण मुल्ला

जब दिल में ज़रा भी आस न हो इज़्हार-ए-तमन्ना कौन करे

आनंद नारायण मुल्ला

कहा झुँझला के अहल-ए-क़ाफ़िला से एक रहबर ने

अम्न लख़नवी

पहले हमारी आँख में बीनाई आई थी

अम्मार इक़बाल

उठ

अमजद नजमी

शिकस्त-ए-जाम

अमजद नजमी

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