दीपक Poetry (page 10)

वो जा चुका है तो क्यूँ बे-क़रार इतने हो

शहज़ाद अहमद

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया

शहज़ाद अहमद

कहीं भी साया नहीं किस तरफ़ चले कोई

शहज़ाद अहमद

कब तक कड़कती धूप में आँखें जलाएँ हम

शहज़ाद अहमद

दिल से ये कह रहा हूँ ज़रा और देख ले

शहज़ाद अहमद

बिखरे हुए तारों से मिरी रात भरी है

शहज़ाद अहमद

बाग़ का बाग़ उजड़ गया कोई कहो पुकार कर

शहज़ाद अहमद

आती है दम-ब-दम ये सदा जागते रहो

शहज़ाद अहमद

ये क्या हुआ कि तबीअ'त सँभलती जाती है

शहरयार

सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का

शहरयार

हवा का ज़ोर ही काफ़ी बहाना होता है

शहरयार

जब आफ़्ताब से चेहरा छुपा रही थी हवा

शहनवाज़ ज़ैदी

कभी क़लम कभी नेज़ों पे सर उछलते हैं

शाहजहाँ बानो याद

सराब-ए-शब भी है ख़्वाब-ए-शिकस्ता-पा भी है

शाहिदा हसन

बात कोई एक पल उस के ध्यान के आने की थी

शाहिदा हसन

ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख

शाहिद ज़की

कहीं कुछ नहीं होता

शाहिद माहुली

बू-ए-पैराहन-ए-सदा आए

शाहिद माहुली

रात ही के दामन में चाँद भी हैं तारे भी

शाहिद लतीफ़

सह-पहर ही से कोई शक्ल बनाती है ये शाम

शाहिद लतीफ़

लोग हैरान हैं हम क्यूँ ये किया करते हैं

शाहिद लतीफ़

इक अज़ाब होता है रोज़ जी का खोना भी

शाहिद लतीफ़

जो इस ज़मीन पे रहते थे आसमान से लोग

शाहिद कमाल

इब्तिदा से मैं इंतिहा का हूँ

शाहिद कमाल

मैं इंतिहा-ए-यास में तन्हा खड़ा रहा

शाहिद कलीम

किताब-ए-दिल के वरक़ जो उलट के देखता है

शाहिद जमाल

रात है शहर-ए-बुताँ है और हम

शाहिद इश्क़ी

नुक़ूश-ए-रहगुज़र-ए-शौक़ सब मिटा देना

शाहिद इश्क़ी

कुछ अपनी बात कहो कुछ मिरी सुनो मत सो

शाहिद इश्क़ी

सुकूँ का एक भी लम्हा जो दिल को मिलता है

शाहीन सिद्दीक़ी

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