दामन Poetry (page 9)

ना-तवाँ इश्क़ ने आख़िर किया ऐसा हम को

शिबली नोमानी

होती है लबों पर ख़ामोशी आँखों में मोहब्बत होती है

शेवन बिजनौरी

क्या ख़बर थी कोई रुस्वा-ए-जहाँ हो जाएगा

शेर सिंह नाज़ देहलवी

दिल के आईने में नित जल्वा-कुनाँ रहता है

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

ज़ख़्मी हूँ तिरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से

ज़ौक़

कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे

ज़ौक़

हुए क्यूँ उस पे आशिक़ हम अभी से

ज़ौक़

कौन बरहम है ज़ुल्फ़-ए-जानाँ से

शैख़ अली बख़्श बीमार

मह्व हूँ मैं जो उस सितमगर का

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल का गिला फ़लक की शिकायत यहाँ नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

आरज़ू थी एक दिन तुझ से मिलूँ

शीन काफ़ निज़ाम

आँखों में रात ख़्वाब का ख़ंजर उतर गया

शीन काफ़ निज़ाम

हम-ज़ाद

शाज़ तमकनत

दिल-शिकस्ता हुए टूटा हुआ पैमान बने

शाज़ तमकनत

बड़े ख़ुलूस से दामन पसारता है कोई

शाज़ तमकनत

उर्दू ज़बान

शायर अली शायर

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

गिन के देता है बला-नोशों को पैमाना अभी

शौक़ बहराइची

ऐ हम-सफ़ीर तलख़ी-ए-तर्ज़-ए-बयाँ न छोड़

शौक़ बहराइची

मेरे महबूब मिरे दिल को जलाया न करो

शौकत परदेसी

हसरतें बन कर निगाहों से बरस जाएँगे हम

शौकत परदेसी

मेज़ों पे सजा के अयाग़ धरो

शरीक़ अदील

ज़ुल्म करते हुए वो शख़्स लरज़ता ही नहीं

शारिब मौरान्वी

पर्दा-ए-रुख़ क्या उठा हर-सू उजाले हो गए

शारिब मौरान्वी

जो आँसुओं की ज़बाँ को मियाँ समझने लगे

शारिब मौरान्वी

दुख़्त-ए-रज़ ज़ाहिद से बोली मुझ से घबराते हो क्यूँ

शरफ़ मुजद्दिदी

तीन शामों की एक शाम

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

शोर-ए-तूफ़ान-ए-हवा है बे-अमाँ सुनते रहो

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

वजूद-ए-बर्क़ ज़रूरी है गुलिस्ताँ के लिए

शम्स इटावी

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