दम Poetry (page 43)

बे-बुलाए हुए जाना मुझे मंज़ूर नहीं

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वो नज़र आईना-फ़ितरत ही सही

बाक़ी सिद्दीक़ी

वो अंधेरा है जिधर जाते हैं हम

बाक़ी सिद्दीक़ी

बस पा-ए-जुनूँ सैर-ए-बयाबाँ तो बहुत की

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सिपाह-ए-इशरत पे फ़ौज-ए-ग़म ने जो मिल के मरकब बहम उठाए

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सैर में तेरी है बुलबुल बोस्ताँ बे-कार है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

चश्म-ए-तर जाम दिल-ए-बादा-कशाँ है शीशा

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

खेत से बच कर गुज़रे बस्ती को वीरानी दे

बाक़र नक़वी

बुझी बुझी है सदा-ए-नग़्मा कहीं कहीं हैं रबाब रौशन

बाक़र मेहदी

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा

बक़ा बलूच

तर्सील

बलराज कोमल

सर्द, तारीक रात

बलराज कोमल

मैं, एक और मैं

बलराज कोमल

इत्तिफ़ाक़

बलराज कोमल

बात बिगड़ी हुई बनी सी रही

बकुल देव

हो चुका वाज़ का असर वाइज़

बहराम जी

तमन्ना है ये दिल में जब तलक है दम में दम अपने

ज़फ़र

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है

ज़फ़र

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

ज़फ़र

क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना

ज़फ़र

न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है

ज़फ़र

मोहब्बत चाहिए बाहम हमें भी हो तुम्हें भी हो

ज़फ़र

मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम

ज़फ़र

ख़्वाह कर इंसाफ़ ज़ालिम ख़्वाह कर बेदाद तू

ज़फ़र

करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे

ज़फ़र

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ

ज़फ़र

इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल कौन कहता सहल है

ज़फ़र

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