दूर Poetry (page 61)

दीवार-ओ-दर का नाम था कोई मकाँ न था

बदनाम नज़र

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

खड़ा था कौन कहाँ कुछ पता चला ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

किसी के जाल में आ कर मैं अपना दिल गँवा बैठा

बाबर रहमान शाह

ख़्वाब-जंगल

अज़रा नक़वी

एक नज़्म रोज़ आती है

अज़रा अब्बास

शाम आई तो कोई ख़ुश-बदनी याद आई

अज़्म बहज़ाद

ये ख़ज़ाने का कोई साँप बना होता है

अज़लान शाह

बे-यक़ीनी का तअल्लुक़ भी यक़ीं से निकला

अज़लान शाह

कमाल ये है कि दुनिया को कुछ पता न लगे

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

उस ने मिरे मरने के लिए आज दुआ की

अज़ीज़ वारसी

सफ़र मुदाम सफ़र

अज़ीज़ तमन्नाई

कहानी

अज़ीज़ तमन्नाई

उफ़ुक़ के उस पार कर रहा है कोई मिरा इंतिज़ार शायद

अज़ीज़ तमन्नाई

करते रहे तआ'क़ुब-ए-अय्याम उम्र-भर

अज़ीज़ तमन्नाई

हर एक रंग में यूँ डूब कर निखरते रहे

अज़ीज़ तमन्नाई

बढ़ने दे अभी कशमकश-ए-तार-ए-नफ़स और

अज़ीज़ तमन्नाई

एक मंज़र एक आलम

अज़ीज़ क़ैसी

अहद-नामा-ए-इमराेज़

अज़ीज़ क़ैसी

पस-ए-तर्क-ए-इश्क़ भी उम्र-भर तरफ़-ए-मिज़ा पे तरी रही

अज़ीज़ क़ैसी

अपनों के करम से या क़ज़ा से

अज़ीज़ क़ैसी

मैं नींद के ऐवान में हैरान था कल शब

अज़ीज़ नबील

बातों में बहुत गहराई है, लहजे में बड़ी सच्चाई है

अज़ीज़ नबील

आँखों के ग़म-कदों में उजाले हुए तो हैं

अज़ीज़ नबील

दुनिया का ख़ून दौर-ए-मोहब्बत में है सफ़ेद

अज़ीज़ लखनवी

बचपने की याद

अज़ीज़ लखनवी

आतिश-ए-ख़ामोश

अज़ीज़ लखनवी

क्यूँ न हो शौक़ तिरे दर पे जबीं-साई का

अज़ीज़ लखनवी

एक ही ख़त में है क्या हाल जो मज़कूर नहीं

अज़ीज़ लखनवी

सुब्ह से चलते चलते आख़िर शाम हुई आवारा-ए-दिल

अज़ीज़ हामिद मदनी

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