दूर Poetry (page 60)

ताबिश-ए-हुस्न हिजाब-ए-रुख़-ए-पुर-नूर नहीं

बर्क़ देहलवी

वो नज़र आईना-फ़ितरत ही सही

बाक़ी सिद्दीक़ी

वो मक़ाम-ए-दिल-ओ-जाँ क्या होगा

बाक़ी सिद्दीक़ी

तुम कब थे क़रीब इतने मैं कब दूर रहा हूँ

बाक़ी सिद्दीक़ी

ख़बर कुछ ऐसी उड़ाई किसी ने गाँव में

बाक़ी सिद्दीक़ी

कहता है हर मकीं से मकाँ बोलते रहो

बाक़ी सिद्दीक़ी

कल मय-कदे की जानिब आहंग-ए-मोहतसिब है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

हाँ मियाँ सच है तुम्हारी तो बला ही जाने

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

काफ़िरी इश्क़ का शेवा है मगर तेरे लिए

बाक़र मेहदी

टूटे शीशे की आख़िरी नज़्म

बाक़र मेहदी

सज़ा

बाक़र मेहदी

बहुत है एक नज़र

बाक़र मेहदी

क्या ख़बर थी कि कभी बे-सर-ओ-सामाँ होंगे

बाक़र मेहदी

ख़बर सुनेगा मिरी मौत की तो ख़ुश होगा

बाक़र मेहदी

कौन भला ये कहता है ख़ुद आ के हम को मनाएँ आप

बाक़र मेहदी

इस दर्जा हुआ ख़ुश कि डरा दिल से बहुत मैं

बाक़र मेहदी

फ़रेब खा के भी शर्मिंदा-ए-सुकूँ न हुए

बाक़र मेहदी

दर्द-ए-दिल आज भी है जोश-ए-वफ़ा आज भी है

बाक़र मेहदी

बरसों पढ़ कर सरकश रह कर ज़ख़्मी हो कर समझा मैं

बाक़र मेहदी

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा

बक़ा बलूच

शायद

बलराज कोमल

एक पुर-असरार सदा

बलराज कोमल

ड्रग स्टोर

बलराज कोमल

बारिशों में ग़ुस्ल करते सब्ज़ पेड़

बलराज कोमल

समाअ'त के लिए इक इम्तिहाँ है

बकुल देव

याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर

ज़फ़र

क़दमों से इतना दूर किनारा कभी न था

बद्र-ए-आलम ख़लिश

हर शख़्स को गुमान कि मंज़िल नहीं है दूर

बद्र वास्ती

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