दूर Poetry (page 58)

ख़ामुशी में क़यास मेरा है

बबल्स होरा सबा

ज़माना-साज़ियों से मैं हमेशा दूर रहता हैं

बिस्मिल सईदी

सहर हुई तो ख़यालों ने मुझ को घेर लिया

बिस्मिल साबरी

आज़ार-ओ-जफ़ा-ए-पैहम से उल्फ़त में जिन्हें आराम नहीं

बिस्मिल इलाहाबादी

आप अपने रक़ीब हैं हम लोग

बिर्ज लाल रअना

एआद-ए-हिकायतें

बिमल कृष्ण अश्क

मिरी भी मान मिरा अक्स मत दिखा मुझ को

बिमल कृष्ण अश्क

कैसे कहें कि चार तरफ़ दायरा न था

बिमल कृष्ण अश्क

ऐसे में रोज़ रोज़ कोई ढूँडता मुझे

बिमल कृष्ण अश्क

घर में जब बेटियाँ नहीं होंगी

बिल्क़ीस ख़ान

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

मेरी एक बुरी आदत थी

बिलाल अहमद

न क़रीब आ न तो दूर जा ये जो फ़ासला है ये ठीक है

भवेश दिलशाद

कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी

भवेश दिलशाद

इस तरह तो और भी दीवानगी बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया

भारत भूषण पन्त

मैं क्या बताऊँ कैसी परेशानियों में हूँ

भारत भूषण पन्त

ख़्वाहिशों से वलवलों से दूर रहना चाहिए

भारत भूषण पन्त

एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं

भारत भूषण पन्त

अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है

भारत भूषण पन्त

ग़म में डूबे ही रहे दम न हमारा निकला

बेख़ुद देहलवी

चश्म-ए-बद-दूर वो भोले भी हैं नादाँ भी हैं

बेख़ुद देहलवी

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा

बेख़ुद देहलवी

दिल में फिर वस्ल के अरमान चले आते हैं

बेख़ुद देहलवी

इस बज़्म में न होश रहेगा ज़रा मुझे

बेखुद बदायुनी

तिरे इश्क़ में ज़िंदगानी लुटा दी

बहज़ाद लखनवी

न तो अपने घर में क़रार है न तिरी गली में क़याम है

बेदम शाह वारसी

न मेहराब-ए-हरम समझे न जाने ताक़-ए-बुत-ख़ाना

बेदम शाह वारसी

बताए देती है बे-पूछे राज़ सब दिल के

बेदम शाह वारसी

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