दूर Poetry (page 67)

मैं जिस को राह दिखाऊँ वही हटाए मुझे

आरिफ़ अब्दुल मतीन

चाँद मेरे घर में उतरा था कहीं डूबा न था

आरिफ़ अब्दुल मतीन

'आरिफ़' अज़ल से तेरा अमल मोमिनाना था

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मेरा बेटा तो है ग़ुरूर मिरा

आराधना प्रसाद

यूँ देखने में तो ऊपर से सख़्त हूँ शायद

अक़ील शादाब

मताअ-ओ-माल न दे दौलत-ए-तबाही दे

अक़ील शादाब

लिबास गर्द का और जिस्म नूर का निकला

अक़ील शादाब

खींच कर तलवार जब तर्क-ए-सितमगर रह गया

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

अज़ाब-ए-हमसफ़री से गुरेज़ था मुझ को

अनवर सिद्दीक़ी

न सह सकूँगा ग़म-ए-ज़ात गो अकेला मैं

अनवर शऊर

क्या बे-मुरव्वती का शिकवा गिला किसी से

अनवर शऊर

हवस बला की मोहब्बत हमें बला की है

अनवर शऊर

बशारत हो कि अब मुझ सा कोई पागल न आएगा

अनवर शऊर

इज़ाफ़ी ज़रूरतों के लिए एक नज़्म

अनवर सेन रॉय

कासा-लेसों ने जो थी नज़्र उतारी तेरी

अनवर सदीद

हद-ए-नज़र से मिरा आसमाँ है पोशीदा

अनवर सदीद

तलख़ाबा-ए-ग़म ख़ंदा-जबीं हो के पिए जा

अनवर साबरी

मंज़िल-ए-शौक़

अनवर नदीम

कहीं और ही चलना होगा

अनवर नदीम

हो सकता है कोई हमें भी ढूँडे इन बंजारों में

अनवर नदीम

नज़दीक की ऐनक से उसे कैसे मैं ढूँडूँ

अनवर मसूद

मेरी पहली नज़्म

अनवर मसूद

दरमियाँ गर न तिरा वादा-ए-फ़र्दा होता

अनवर मसूद

कहाँ तक दूर रह पाऊँगा ख़ुद से

अनवर ख़ान

शिकस्ता-पा ही सही दूर की सदा ही सही

अनवार फ़िरोज़

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

ये नर्म हाथ मरे हाथ में थमा दीजे

अनवर अंजुम

कोई सदा न दूर तलक नक़्श-ए-पा कोई

अनवर अंजुम

कब लज़्ज़तों ने ज़ेहन का पीछा नहीं किया

अनवर अंजुम

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