दर्द Poetry (page 28)

यहाँ वहाँ कुछ लफ़्ज़ हैं मेरे नज़्में ग़ज़लें तेरी हैं

सलीम मुहीउद्दीन

आईनों से धूल मिटाने आते हैं

सलीम मुहीउद्दीन

तिरी तलाश में गुज़रे कई ज़माने मुझे

सलीम काशीर

मैं रात हव्वा

सलीम फ़िगार

फ़स्ल-ए-जुनूँ में दामन-ओ-दिल चाक भी नहीं

सलीम फ़राज़

चेहरे पे उस के अश्क की तहरीर बन गई

सलीम बेताब

न जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

सलीम अहमद

लिबास-ए-दर्द भी हम ने उतारा

सलीम अहमद

आँसुओं से तू है ख़ाली दर्द से आरी हूँ मैं

सलीम अहमद

तिरी जानिब से दिल में वसवसे हैं

सलीम अहमद

'सलीम' दिल को मयस्सर सकूँ ज़रा न हुआ

सलीम अहमद

न जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

सलीम अहमद

ख़ैर का तुझ को यक़ीं है और उस को शर का है

सलीम अहमद

जो बात दिल में थी वो कब ज़बान पर आई

सलीम अहमद

जाने किसी ने क्या कहा तेज़ हवा के शोर में

सलीम अहमद

दिलों में दर्द भरता आँख में गौहर बनाता हूँ

सलीम अहमद

दिल के अंदर दर्द आँखों में नमी बन जाइए

सलीम अहमद

बजा ये रौनक़-ए-महफ़िल मगर कहाँ हैं वो लोग

सलीम अहमद

वो ज़िंदा है

सलाम मछली शहरी

कश्मकश

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

मैं तो कहता हूँ तुम्ही दर्द के दरमाँ हो ज़रूर

सलाम मछली शहरी

इन ग़ज़ालान-ए-तरह-दार को कैसे छोड़ूँ

सलाम मछली शहरी

कार्तिक

सलाहुद्दीन परवेज़

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

दम-ए-यार ता-नज़'अ भर लीजिए

सख़ी लख़नवी

निराली रातें

सज्जाद ज़हीर

मैं हम-नफ़साँ जिस्म हूँ वो जाँ की तरह था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ज़ख़्म खुले पड़ते हैं दिल के मौसम है ये बहारों का

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ज़बाँ को ज़ाइका-ए-शेर-ए-तर नहीं मिलता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

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