दश्त Poetry (page 37)

गीत

अहमद नदीम क़ासमी

दुआ

अहमद नदीम क़ासमी

दश्त-ए-वफ़ा

अहमद नदीम क़ासमी

वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे

अहमद नदीम क़ासमी

उम्र भर उस ने इसी तरह लुभाया है मुझे

अहमद नदीम क़ासमी

तंग आ जाते हैं दरिया जो कुहिस्तानों में

अहमद नदीम क़ासमी

मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ

अहमद नदीम क़ासमी

खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए

अहमद नदीम क़ासमी

हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते

अहमद नदीम क़ासमी

दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ न गई

अहमद नदीम क़ासमी

थम गया दर्द उजाला हुआ तन्हाई में

अहमद मुश्ताक़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

हम को आवारगी किस दश्त में लाई है कि अब

अहमद महफ़ूज़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

उस से रिश्ता है अभी तक मेरा

अहमद महफ़ूज़

लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का

अहमद महफ़ूज़

किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए

अहमद महफ़ूज़

कोई तो दश्त समुंदर में ढल गया आख़िर

अहमद ख़याल

ज़िंदगी ख़ौफ़ से तश्कील नहीं करनी मुझे

अहमद ख़याल

मिरे अंदर रवानी ख़त्म होती जा रही है

अहमद ख़याल

जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया

अहमद ख़याल

फ़ना के दश्त में कब का उतर गया था मैं

अहमद ख़याल

दरिया में दश्त दश्त में दरिया सराब है

अहमद ख़याल

बस्ती से चंद रोज़ किनारा करूँगा मैं

अहमद ख़याल

ऐ तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक

अहमद ख़याल

दिल आईना है मगर इक निगाह करने को

अहमद जावेद

फ़ीरोज़ी तस्बीह का घेरा हाथ में जल्वा-अफ़्गन था

अहमद जहाँगीर

ये तेरी चाह भी क्या तेरी आरज़ू भी क्या

अहमद हमदानी

याद क्या क्या लोग दश्त-ए-बे-कराँ में आए थे

अहमद हमदानी

मुज़्तरिब हैं वक़्त के ज़र्रात सूरज से कहो

अहमद हमदानी

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