दिल Poetry (page 106)

है शर्त क़ीमत-ए-हुनर भी अब तो रब्त-ए-ख़ास पर

शाहिदा तबस्सुम

सवाद-ए-शाम से ता-सुब्ह-ए-बे-किनार गई

शाहिदा हसन

सराब-ए-शब भी है ख़्वाब-ए-शिकस्ता-पा भी है

शाहिदा हसन

सलीक़ा इश्क़ में मेरा बड़े कमाल का था

शाहिदा हसन

चराग़-ए-शाम ही तन्हा नहीं है

शाहिदा हसन

मैं अपने हिस्से की तन्हाई महफ़िल से निकालूँगा

शाहिद ज़की

बिछड़ गया था कोई ख़्वाब-ए-दिल-नशीं मुझ से

शाहिद ज़की

मौज आए कोई हल्क़ा-ए-गिर्दाब की सूरत

शाहिद शैदाई

आँखों में है पर आँख ने देखा नहीं अभी

शाहिद शैदाई

ज़ेहन में लगता है जब ख़ुश-रंग लफ़्ज़ों का हुजूम

शाहिद मीर

तारीकियों का हम थे हदफ़ देखते रहे

शाहिद मीर

मीनारों से ऊपर निकला दीवारों से पार हुआ

शाहिद मीर

मजमा' मिरे हिसार में सैलानियों का है

शाहिद मीर

एक लम्हा

शाहिद माहुली

रात ऐसी कि कभी जिस का सवेरा न हुआ

शाहिद माहुली

कुछ दर्द बढ़ा है तो मुदावा भी हुआ है

शाहिद माहुली

हाशिए पर कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ख़्वाब का

शाहिद माहुली

हर मरहले से यूँ तो गुज़र जाएगी ये शाम

शाहिद माहुली

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

ग़म की तहज़ीब अज़िय्यत का क़रीना सीखें

शाहिद माहुली

ग़म की तहज़ीब अज़िय्यत का क़रीना सीखें

शाहिद माहुली

बू-ए-पैराहन-ए-सदा आए

शाहिद माहुली

बाम-ओ-दर टूट गए बह गया पानी कितना

शाहिद माहुली

कूज़ा-ए-दर्द में ख़ुशियों के समुंदर रख दे

शाहिद कमाल

कुंज-ए-दिल में है जो मलाल उछाल

शाहिद कमाल

ख़ुशियाँ मत दे मुझ को दर्द-ओ-कैफ़ की दौलत दे साईं

शाहिद कमाल

ग़मों की रात है और इतनी मुख़्तसर भी नहीं

शाहिद कमाल

भर गए ज़ख़्म तो क्या दर्द तो अब भी कोई है

शाहिद कमाल

ब-हर्फ़-ए-सूरत इंकार तोड़ दी मैं ने

शाहिद कमाल

ऐ ज़ौक़ अर्ज़-ए-हुनर हर्फ़-ए-ए'तिदाल में रख

शाहिद कमाल

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