दिल Poetry (page 107)

अब्र लिखती है कहीं और घटा लिखती है

शाहिद कमाल

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

मिरी नज़र कि तरह दिल परिंद ओझल है

शाहिद जमील

पहाड़ होने का सारा ग़ुरूर काँप उठा

शाहिद जमाल

किताब-ए-दिल के वरक़ जो उलट के देखता है

शाहिद जमाल

वो हर्फ़-ए-शौक़ हूँ जिस का कोई सियाक़ न हो

शाहिद इश्क़ी

शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले

शाहिद इश्क़ी

रात भी बाक़ी है सहबा भी शीशा भी पैमाना भी

शाहिद इश्क़ी

फिर उसी शोख़ की तस्वीर उतर आई है

शाहिद इश्क़ी

नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ उस की ख़ातिर रहन-ए-जाम करो

शाहिद इश्क़ी

न ख़ुदा है न नाख़ुदा है कोई

शाहिद इश्क़ी

मुब्तला रूह के अज़ाब में हूँ

शाहिद इश्क़ी

मिरे क़रीब से गुज़रा इक अजनबी की तरह

शाहिद इश्क़ी

महताब है न अक्स-ए-रुख़-ए-यार अब कोई

शाहिद इश्क़ी

लुत्फ़ से तेरे सिवा दर्द महक जाता है

शाहिद इश्क़ी

लज़्ज़त-ए-संग न पूछो लोगो उम्र अगर हाथ आए फिर

शाहिद इश्क़ी

लाए तो नक़्द-ए-जाँ सर-ए-बाज़ार क्या कहें

शाहिद इश्क़ी

कुछ अपनी बात कहो कुछ मिरी सुनो मत सो

शाहिद इश्क़ी

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

जाने क्या वज्ह-ए-बेगानगी है

शाहिद इश्क़ी

हर परी-वश का ए'तिबार करो

शाहिद इश्क़ी

ग़ैर की आग में कोई भी न जलना चाहे

शाहिद इश्क़ी

फ़स्ल-ए-गुल तोहमत-ए-जुनूँ लाई

शाहिद इश्क़ी

दिए हैं रंज सारे आगही ने

शाहिद इश्क़ी

चराग़-ए-ज़ीस्त के दोनों सिरे जलाओ मत

शाहिद इश्क़ी

मेरे दिल में घर भी बनाता रहता है

शाहिद ग़ाज़ी

ख़याल उन का सताए जा रहा है

शाहिद ग़ाज़ी

इन सभी दरख़्तों को आँधियों ने घेरा है

शाहिद ग़ाज़ी

हम दोनों ने नाम लिखा था साहिल पर

शाहिद फ़रीद

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