दिल Poetry (page 109)

कुछ भी न जब दिखाई दे तब देखता हूँ मैं

शाहीन अब्बास

देखना है कब ज़मीं को ख़ाली कर जाता है दिन

शाहीन अब्बास

दाने के बा'द कुछ नहीं दाम के बा'द कुछ नहीं

शाहीन अब्बास

पराए शहर में ख़ुशबू तलाश लेते हैं

शाहबाज़ रिज़्वी

किसी आसेब-ज़दा दिल की सदा है क्या है

शाहबाज़ रिज़्वी

ख़्वाब से दिल-लगी न कर लेना

शाहबाज़ रिज़्वी

इक ग़लत-फ़हमी ने दिल का आइना धुँदला दिया

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

साअत-ए-आसूदगी देखे हुए अर्सा हुआ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

गरमी-ए-पहलू-ए-दिलदार ने सोने न दिया

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

कड़े हैं हिज्र के लम्हात उस से कह देना

शहबाज़ ख़्वाजा

ऐसे रखती है हमें तेरी मोहब्बत ज़िंदा

शहबाज़ ख़्वाजा

हम क़ुव्वत-ए-जज़्ब-ए-दिल दिखाएँ

शहाबुद्दीन साक़िब

मौत टलती है तो दिल दुखता है

शहाब सफ़दर

जब भी कश्ती के मुक़ाबिल भँवर आता है कोई

शहाब सफ़दर

तस्ख़ीर-ए-फ़ितरत के बअ'द

शहाब जाफ़री

तलाश

शहाब जाफ़री

सूरज का शहर

शहाब जाफ़री

शहर-ए-अना में

शहाब जाफ़री

रुत्बा-ए-दर्द को जब अपना हुनर पहुँचेगा

शहाब जाफ़री

क़ैद-ए-इम्काँ से तमन्ना थी गमीं छूट गई

शहाब जाफ़री

हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का मौसम निकल गया

शहाब जाफ़री

हयात में भी अजल का समाँ दिखाई दे

शहाब जाफ़री

दिल पर वफ़ा का बोझ उठाते रहे हैं हम

शहाब जाफ़री

दश्त-ए-ग़ुर्बत है तो वो क्यूँ हैं ख़फ़ा हम से बहुत

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

ख़ून ये जाता रगों से फूट कर

शहाब अशरफ़

वो बदन फूल की बाहोँ में पला हो जैसे

शहाब अशरफ़

भरा घर है कोई सहरा नहीं है

शहाब अशरफ़

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की तरह सेहर-बयाँ से निकले

शहाब अख़्तर

तू तो इक परचा भी वाँ से नामा-बर लाया न आह

शाह नसीर

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