दिल Poetry (page 110)

तेरे ख़याल-ए-नाफ़ से चक्कर में किया है दिल

शाह नसीर

शराब लाओ कबाब लाओ हमारे दिल को न अब घटाओ

शाह नसीर

सौ बार बोसा-ए-लब-ए-शीरीं वो दे तो लूँ

शाह नसीर

सरज़मीन-ए-ज़ुल्फ़ में क्या दिल ठिकाने लग गया

शाह नसीर

सरज़मीं ज़ुल्फ़ की जागीर में थी इस दिल की

शाह नसीर

सर-बुलंदी को यहाँ दिल ने न चाहा मुनइम

शाह नसीर

रुवाक़-ए-चशम में मत रह कि है मकान-ए-नुज़ूल

शाह नसीर

न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का

शाह नसीर

न हाथ रख मिरे सीने पे दिल नहीं इस में

शाह नसीर

मता-ए-दिल बहुत अर्ज़ां है क्यूँ नहीं लेते

शाह नसीर

ले गया दे एक बोसा अक़्ल ओ दीन ओ दिल वो शोख़

शाह नसीर

लगाई किस बुत-ए-मय-नोश ने है ताक उस पर

शाह नसीर

लगा न दिल को तू अपने किसी से देख 'नसीर'

शाह नसीर

लगा जब अक्स-ए-अबरू देखने दिलदार पानी में

शाह नसीर

ख़याल-ए-नाफ़-ए-बुताँ से हो क्यूँ कि दिल जाँ-बर

शाह नसीर

हवा पर है ये बुनियाद-ए-मुसाफ़िर ख़ाना-ए-हस्ती

शाह नसीर

इक आबला था सो भी गया ख़ार-ए-ग़म से फट

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

चमन में ग़ुंचा मुँह खोले है जब कुछ दिल की कहने को

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ का क्या उस की चटका लग गया

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ छुटती तिरे रुख़ पर तो दिल अपना फिरता

शाह नसीर

यारो नहीं इतना मुझे क़ातिल ने सताया

शाह नसीर

वाँ कमर बाँधे हैं मिज़्गाँ क़त्ल पर दोनों तरफ़

शाह नसीर

उस काकुल-ए-पुर-ख़म का ख़लल जाए तो अच्छा

शाह नसीर

उधर अब्र ले चश्म-ए-नम को चला

शाह नसीर

तू ज़िद से शब-ए-वस्ल न आया तो हुआ क्या

शाह नसीर

तिरे दाँत सारे सफ़ेद हैं पए-ज़ेब पान से मल कर आ

शाह नसीर

टाँकों से ज़ख़्म-ए-पहलू लगता है कंखजूरा

शाह नसीर

तलब में बोसे की क्या है हुज्जत सवाल दीगर जवाब दीगर

शाह नसीर

सुब्ह-ए-गुलशन में हो गर वो गुल-ए-ख़ंदाँ पैदा

शाह नसीर

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