दिल Poetry (page 105)

ख़ला सा कहीं है

शहराम सर्मदी

कल शाम

शहराम सर्मदी

अहल-ए-दिल को बुला रहा हूँ

शहराम सर्मदी

याद की बस्ती का यूँ तो हर मकाँ ख़ाली हुआ

शहराम सर्मदी

तो क्या तड़प न थी अब के मिरे पुकारे में

शहराम सर्मदी

सुन रखा था तजरबा लेकिन ये पहला था मिरा

शहराम सर्मदी

नसीब-ए-चश्म में लिक्खा है गर पानी नहीं होना

शहराम सर्मदी

मिरे सुख़न पे इक एहसान अब के साल तो कर

शहराम सर्मदी

मता-ए-पास-ए-वफ़ा खो नहीं सकूँगा मैं

शहराम सर्मदी

ख़ला सा ठहरा हुआ है ये चार-सू कैसा

शहराम सर्मदी

हुक्मराँ जब से हुईं बस्ती पे अफ़्वाहें वहाँ

शहराम सर्मदी

फ़ज़ा होती ग़ुबार-आलूदा सूरज डूबता होता

शहराम सर्मदी

कभी जो मारका ख़्वाबों से रत-जगों का हुआ

शहनाज़ नूर

हवा के हौसले ज़ंजीर करना चाहता है

शहनाज़ नूर

हम-सफ़र ज़ीस्त का सूरज को बनाए रक्खा

शहनाज़ नूर

ज़मीं थम गई है

शहनाज़ नबी

नींद की माती

शहनाज़ नबी

मस्कन

शहनाज़ नबी

गुलशन-ए-ना-आफ़रीदा

शहनाज़ नबी

ज़िंदगी में यूँ तो हर इक हादिसा नागाह था

शहनाज़ नबी

मिरी तरह से कहीं ख़ाक छानता होगा

शहनाज़ मुज़म्मिल

इश्क़ को अपने लिए समझा असासा दिल का

शहनाज़ मुज़म्मिल

ग़म मुझ से किसी तौर समेटा नहीं जाता

शहनाज़ मुज़म्मिल

शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की दवा मैं क्या करता

शहनवाज़ ज़ैदी

सभी रास्ते तिरे नाम के सभी फ़ासले तिरे नाम के

शहनवाज़ ज़ैदी

हर किसी ख़्वाब के चेहरे पे लिखूँ नाम तिरा

शहनवाज़ ज़ैदी

आओ फिर मिल जाएँ सब बातें पुरानी छोड़ कर

शहनवाज़ ज़ैदी

अक़्ल-ओ-दिल को मिला-जुला रखिए

शाहजहाँ बानो याद

उसे जब भी देखा बहुत ध्यान से

शाहिदा तबस्सुम

संग-ज़नों के वास्ते फिर नए रास्तों में है

शाहिदा तबस्सुम

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