दिल Poetry (page 103)

दिल-ए-फ़सुर्दा उसे क्यूँ गले लगा न लिया

शहज़ाद अहमद

दिल ओ दिमाग़ में एहसास-ए-ग़म उभार दिया

शहज़ाद अहमद

दिल का बुरा नहीं मगर शख़्स अजीब ढब का है

शहज़ाद अहमद

देख अब अपने हयूले को फ़ना होते हुए

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया

शहज़ाद अहमद

बिखरे हुए तारों से मिरी रात भरी है

शहज़ाद अहमद

भटकती हैं ज़माने में हवाएँ

शहज़ाद अहमद

बे-ताबी-ए-ग़म-हा-ए-दरूँ कम नहीं होगी

शहज़ाद अहमद

बाग़ का बाग़ उजड़ गया कोई कहो पुकार कर

शहज़ाद अहमद

अक़्ल हर बात पे हैराँ है इसे क्या कहिए

शहज़ाद अहमद

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

शहज़ाद अहमद

अब निभानी ही पड़ेगी दोस्ती जैसी भी है

शहज़ाद अहमद

अब न वो शोर न वो शोर मचाने वाले

शहज़ाद अहमद

आप भी नहीं आए नींद भी नहीं आई

शहज़ाद अहमद

आज तक उस की मोहब्बत का नशा तारी है

शहज़ाद अहमद

ज़ख़्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से

शहरयार

ये जब है कि इक ख़्वाब से रिश्ता है हमारा

शहरयार

नज़राना तेरे हुस्न को क्या दें कि अपने पास

शहरयार

न ख़ुश-गुमान हो इस पर तू ऐ दिल-ए-सादा

शहरयार

क्यूँ आज उस का ज़िक्र मुझे ख़ुश न कर सका

शहरयार

कहने को तो हर बात कही तेरे मुक़ाबिल

शहरयार

जान-बूझ कर समझ कर मैं ने भुला दिया

शहरयार

बे-नाम से इक ख़ौफ़ से दिल क्यूँ है परेशाँ

शहरयार

रतजगों का ज़वाल

शहरयार

मौत

शहरयार

ला-ज़वाल सुकूत

शहरयार

ख़्वाब

शहरयार

गुम-शुदा

शहरयार

एक और साल गिरह

शहरयार

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