दिल Poetry (page 101)

तिरा मैं क्या करूँ ऐ दिल तुझे कुछ भी नहीं आता

शहज़ाद अहमद

मंज़िल है कठिन दिल बहुत आराम-तलब है

शहज़ाद अहमद

कुछ तेरे सबब थी मिरे पहलू में हरारत

शहज़ाद अहमद

कुछ देखने की दिल में तमन्ना नहीं बाक़ी

शहज़ाद अहमद

ख़ुद पर भी खोलिए न कभी दिल की वारदात

शहज़ाद अहमद

हुज़ूर-ए-हुस्न ये दिल कासा-ए-गदाई है

शहज़ाद अहमद

हम जो दस्तक कभी देते थे सबा की मानिंद

शहज़ाद अहमद

हैराँ हूँ हासिदों को पता कैसे चल गया

शहज़ाद अहमद

गोशा-ए-दिल की ख़मोशी का तमन्नाई मैं

शहज़ाद अहमद

इक आग फिर भड़क उट्ठी है दीदा ओ दिल में

शहज़ाद अहमद

दिल ओ निगाह का ये फ़ासला भी क्यूँ रह जाए

शहज़ाद अहमद

बस एक लम्हे में क्या कुछ गुज़र गई दिल पर

शहज़ाद अहमद

अगर दो दिल कहीं भी मिल गए हैं

शहज़ाद अहमद

अब तो साफ़ सुनता हूँ अपने दिल की हर धड़कन

शहज़ाद अहमद

मैं और तू

शहज़ाद अहमद

गामज़न

शहज़ाद अहमद

एक दरख़्त

शहज़ाद अहमद

अन-कही

शहज़ाद अहमद

ज़मीं अपने लहू से आश्ना होने ही वाली है

शहज़ाद अहमद

ये सोच कर कि तेरी जबीं पर न बल पड़े

शहज़ाद अहमद

ये न हो वो भूलने वाला भुला देना पड़े

शहज़ाद अहमद

ये किस के आने के इम्काँ दिखाई देते हैं

शहज़ाद अहमद

ये किस ग़म से अक़ीदत हो गई है

शहज़ाद अहमद

ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से

शहज़ाद अहमद

वो मिरे पास है क्या पास बुलाऊँ उस को

शहज़ाद अहमद

वो जा चुका है तो क्यूँ बे-क़रार इतने हो

शहज़ाद अहमद

थोड़ा सा रंग रात के चेहरे पे डाल दो

शहज़ाद अहमद

तिरी तलाश तो क्या तेरी आस भी न रहे

शहज़ाद अहमद

सूरज की किरन देख के बेज़ार हुए हो

शहज़ाद अहमद

सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख कर

शहज़ाद अहमद

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