दिल Poetry (page 115)

पास उस बुत के जो ग़ैर आ के कोई बैठ गया

शाद लखनवी

नज़रों से गुलों की नौ-निहालो

शाद लखनवी

ना-तवाँ वो हूँ निगाहों में समा ही न सकूँ

शाद लखनवी

न जान कर गुल-ए-बाज़ी बहुत उछाल के फेंक

शाद लखनवी

मिस्ल-ए-ख़ंजर लेसान रखते हैं

शाद लखनवी

लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ

शाद लखनवी

क्या कहूँ ग़ुंचा-ए-गुल नीम-दहाँ है कुछ और

शाद लखनवी

ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं

शाद लखनवी

ख़त देखिए दीदार की सूझी ये नई है

शाद लखनवी

कहते हैं नाला-ए-हज़ीं सुन के

शाद लखनवी

जो मुर्ग़-ए-क़िबला-नुमा बन के आशियाँ से चले

शाद लखनवी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

जी जाऊँ जो बंद नातिक़ा हो

शाद लखनवी

जान या दिल नज़्र करना चाहिए

शाद लखनवी

इश्क़ में ज़ोर उम्र-भर मारा

शाद लखनवी

हम ने बाँधे हैं उस पे क्या क्या जोड़

शाद लखनवी

हुई तो जा दिल में उस सनम की नमाज़ में सर झुका झुका कर

शाद लखनवी

हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के

शाद लखनवी

ग़ैरों में हिना वो मल रहा है

शाद लखनवी

गले लिपटे हैं वो बिजली के डर से

शाद लखनवी

दुनिया में क़स्र-ओ-ऐवाँ बे-फ़ाएदा बनाया

शाद लखनवी

दुनिया भी अजब हसीन ज़न है

शाद लखनवी

दुनिया भी अजब हसीन ज़न है

शाद लखनवी

दुखा दिल भी टुकड़े जिगर होते होते

शाद लखनवी

दिल की कहूँ या कहूँ जिगर की

शाद लखनवी

दम-ब-ख़ुद हम तो डरे बैठे हैं

शाद लखनवी

बोसा ज़ुल्फ़-ए-दोता का दो

शाद लखनवी

ऐ बद-गुमाँ तिरा है गुमाँ और की तरफ़

शाद लखनवी

अब्र-ए-दीदा का मिरे हो जो न ओझढ़ पानी

शाद लखनवी

निहायत इंकिसारी आजिज़ी से बात करते हैं

शाद बिलगवी

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