दिल Poetry (page 113)

एक सूरज को सुरख़-रू कर के

सगुफ़ता यासमीन

वफ़ा के दाग़ को दिल से मिटा नहीं सकता

शाग़िल क़ादरी

थी लगन सुनते तिरी शोख़ी-ए-पा की आहट

शाग़िल क़ादरी

सोज़-ए-दरूँ हमारा ज़ाहिर न हो किसी पर

शाग़िल क़ादरी

मेहमाँ है कोई दम का ज़माना शबाब का

शाग़िल क़ादरी

मौसम-ए-गुल आ गया फिर दश्त-पैमाई रहे

शाग़िल क़ादरी

कब मुझे ताला-ए-ना-साज़ पे रोना आया

शाग़िल क़ादरी

बला जाने किसी की हिज्र में इस दिल पे क्या गुज़री

शाग़िल क़ादरी

अपने ख़ूँ का उन पे क्यूँ दा'वा किया

शाग़िल क़ादरी

सदियों तुम्हारी याद में शमएँ जलाएँगे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

रंगों लफ़्ज़ों आवाज़ों से सारे रिश्ते टूट गए

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

क़ुर्बत-ए-हुस्न में भी दर्द के आसार मिले

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ने तो यही मा'रका मारा है सफ़र में

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ख़राबे में बसर कर गए ख़ामोशी से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हमारे पास था जो कुछ लुटा के बैठ रहे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

उम्र भर डोलती यादों की ज़िया से खेले

शफ़क़त बटालवी

पानियों से रेत पर जो आ गया मेरी तरह

शफ़ीउल्लाह राज़

हम न जाएँगे रहनुमा के क़रीब

शफ़ीउल्लाह राज़

वो जिन की छाँव में पले बड़े हुए

शफ़ीक़ सलीमी

सारी ताबीरें हैं उस की सारे ख़्वाब उस के लिए

शफ़ीक़ सलीमी

कुंज-ए-तन्हाई बसाए हिज्र की लज़्ज़त में हूँ

शफ़ीक़ सलीमी

गाँव रफ़्ता रफ़्ता बनते जाते हैं अब शहर

शफ़ीक़ सलीमी

इक पल भी मिरे हाल से ग़ाफ़िल नहीं ठहरा

शफ़ीक़ सलीमी

बजा कि हर कोई अपनी ही अहमियत चाहे

शफ़ीक़ सलीमी

मुझ से आँखें लड़ा रहा है कोई

शफ़ीक़ ख़लिश

दोस्त या दुश्मन-ए-जाँ कुछ भी तुम अब बन जाओ

शफ़ीक़ ख़लिश

भरी महफ़िल में तन्हाई का आलम ढूँड लेता है

शफ़ीक़ ख़लिश

वो गर्म आँसुओं की रवानी तमाम रात

शफ़ीक़ जौनपुरी

कोई टूटी हुई कश्ती का तख़्ता भी अगर है ला

शफ़ीक़ जौनपुरी

ऐसी नींद आई कि फिर मौत को प्यार आ ही गया

शफ़ीक़ जौनपुरी

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