दिल Poetry (page 114)

ज़िंदगी तुझ से हमें अब कोई शिकवा ही नहीं

शफ़ीक़ देहलवी

शब-ए-फ़िराक़ का मारा हूँ दिल-गिरफ़्ता हूँ

शफ़ीक़ देहलवी

इक कार-ए-गराँ है खेल नहीं

शफ़ीक़ देहलवी

अगर वो हम-सफ़र ठहरें तो हम को डर में रखते हैं

शफ़ीक़ आसिफ़

इक तरफ़ तलब तेरी इक तरफ़ ज़माना है

शफ़ीक़ अहमद

ख़ुद अपनी आँच से इक शख़्स जल गया मुझ में

शफ़ी ज़ामिन

ये क्या कि मेरे यक़ीं में ज़रा गुमाँ भी है

शफ़क़ सुपुरी

ये इश्क़ भी अजीब है इक आन हो गया

शफ़क़ सुपुरी

मुझे किसी पे मोहब्बत का कुछ गुमाँ सा है

शफ़क़ सुपुरी

कहीं कुछ और भी है ख़्वाहिश-ए-दिगर के बा'द

शफ़क़ सुपुरी

आँखों से मअ'नी-ए-सुख़न-ए-मीर देखते

शफ़क़ सुपुरी

दिल तड़प जाए न क्यूँ सुन कर फ़ुग़ान-ए-अहल-ए-दर्द

शफ़क़ इमादपुरी

ज़बाँ ख़मोश रहे तर्क-ए-मुद्दआ न करे

शायर फतहपुरी

सर-ए-तस्लीम ख़म करना पड़ा तक़्सीर से पहले

शायर फतहपुरी

ना-फ़हम कहूँ मैं उसे ऐसा भी नहीं है

शायर फतहपुरी

मज़ा शबाब का जब है कि बा-ख़ुदा भी रहे

शायर फतहपुरी

जो कैफ़-ए-इश्क़ से ख़ाली हो ज़िंदगी किया है

शायर फतहपुरी

गुल-ए-ख़ुश-नुमा के लिबास में कि शुआ-ए-नूर में ढल के आ

शायर फतहपुरी

फ़साना-ए-सितम-ए-काएनात कहते हैं

शायर फतहपुरी

दम-ए-ता'मीर तख़रीब-ए-जहाँ कुछ और कहती है

शायर फतहपुरी

सर-ए-बज़्म मेरी नज़र से जब वो निगाह-ए-होश-रुबा मिली

शादाँ इंदौरी

लिल्लाह कोई कोशिश न करे उल्फ़त में मुझे समझाने की

शादाँ इंदौरी

हम उन से कर गए हैं किनारा कभी कभी

शादाँ इंदौरी

सजे हैं हर तरफ़ बाज़ार ऐसा क्यूँ नहीं होता

शादाब उल्फ़त

अब ज़मीन-ओ-आसमाँ के सब किनारों से अलग

शादाब उल्फ़त

वो मय-परस्त हूँ बदली न जब नज़र आई

शाद लखनवी

उस ने अफ़्शाँ जो चुनी रात को तन्हा हो कर

शाद लखनवी

तस्वीर मिरी है अक्स तिरा तू और नहीं मैं और नहीं

शाद लखनवी

शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ

शाद लखनवी

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

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