दिल Poetry (page 117)

किसी की मुंतज़िर अब दिल की रह-गुज़ार नहीं

शबनम वहीद

ये सिलसिले भी रिफ़ाक़त के कुछ अजीब से हैं

शबनम शकील

वो तो आईना-नुमा था मुझ को

शबनम शकील

वहाँ भी ज़हर-ज़बाँ काम कर गया होगा

शबनम शकील

उन की शर्मिंदा-ए-एहसान सी हो जाती है

शबनम शकील

तन्हा खड़े हैं हम सर-ए-बाज़ार क्या करें

शबनम शकील

सिमट न पाए कि हर-सू बिखर गए थे हम

शबनम शकील

मिरा जीना गवाही दे रहा है

शबनम शकील

मौसम के पास कोई ख़बर मो'तबर भी हो

शबनम शकील

मंज़र से कभी दिल के वो हटता ही नहीं है

शबनम शकील

हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं

शबनम शकील

गए बरस की यही बात यादगार रही

शबनम शकील

इक बे-नाम सी खोज है दिल को जिस के असर में रहते हैं

शबनम शकील

दूर हुआ इबहाम कहानी ख़त्म हुई

शबनम शकील

दोस्तों का ज़िक्र क्या दुश्मन हैं जब बदले हुए

शबनम शकील

दिल में ख़ूँ और आँख में पानी बहुत

शबनम शकील

दर आया अंधेरा आँखों में और सब मंज़र धुँदलाए हैं

शबनम शकील

चलती रहती है तसलसुल से जुनूँ-ख़ेज़ हवा

शबनम शकील

बदल चुकी है हर इक याद अपनी सूरत भी

शबनम शकील

अक्सर अपने दर-पए-आज़ार हो जाते हैं हम

शबनम शकील

अब मुझ को क्या ख़बर वो यहाँ है भी या नहीं

शबनम शकील

तमाम उम्र की आवारगी पे भारी है

शबनम रूमानी

मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद

शबनम रूमानी

अब उन्हें मुझ से कुछ हिजाब नहीं

शबनम रूमानी

पी रहा है ज़िंदगी की धूप कितने प्यार से

शबनम नक़वी

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

जब ख़िलाफ़-ए-मस्लहत जीने की नौबत आई थी

शब्बीर शाहिद

जब ख़िलाफ़-ए-मस्लहत जीने की नौबत आई थी

शब्बीर शाहिद

बहार की धूप में नज़ारे हैं उस किनारे

शब्बीर शाहिद

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