दिल Poetry (page 118)

भूकी है ज़मीं भूक उगलती ही रहेगी

शब्बीर नकिद

हिसार-ए-ज़ात में सारा जहान होना था

शबाना यूसुफ़

शब-ए-विसाल थी रौशन फ़ज़ा में बैठा था

शबाब ललित

ले के बे-शक हाथ में ख़ंजर चलो

शबाब ललित

आ गया है वक़्त अब भुगतोगे ख़ामियाज़े बहुत

शबाब ललित

कहाँ फ़ुर्क़त में है दिलदार उठना बैठना चलना

शबाब

कभी भूल कर भी न बात की मुझे दिल से ऐसा भुला दिया

शबाब

आशिक़ की जान जाती है इस बाँकपन को छोड़

शबाब

कितने दिल थे जो हो गए पत्थर

शायर लखनवी

उन का ग़म भी न रहा पास तो फिर क्या होगा

शायर लखनवी

जुदा हो कर वो हम से है जुदा क्या

शायर लखनवी

जो थके थके से थे हौसले वो शबाब बन के मचल गए

शायर लखनवी

जो ग़म-ए-हबीब से दूर थे वो ख़ुद अपनी आग में जल गए

शायर लखनवी

जेहल को इल्म का मेआ'र समझ लेते हैं

शायर लखनवी

हवा को और भी कुछ तेज़ कर गए हैं लोग

शायर लखनवी

इक तबस्सुम से हम ने रोक लिए

शायर लखनवी

आँसू शो'लों में ढल रहे हैं

शायर लखनवी

वही इक फ़रेब हसरत कि था बख़्शिश-ए-निगाराँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

उम्मीद के उफ़ुक़ से न उट्ठा ग़ुबार तक

शानुल हक़ हक़्क़ी

तुम से उल्फ़त के तक़ाज़े न निबाहे जाते

शानुल हक़ हक़्क़ी

समझ में ख़ाक ये जादूगरी नहीं आती

शानुल हक़ हक़्क़ी

पाई न कोई मंज़िल पहुँचीं न कहीं राहें

शानुल हक़ हक़्क़ी

निकले तिरी दुनिया के सितम और तरह के

शानुल हक़ हक़्क़ी

नज़र चुरा गए इज़हार-ए-मुद्दआ से मिरे

शानुल हक़ हक़्क़ी

नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे

शानुल हक़ हक़्क़ी

जो हो वरा-ए-ज़ात वो जीना ही और है

शानुल हक़ हक़्क़ी

जहान-ए-दिल में हुए इंक़लाब और ही कुछ

शानुल हक़ हक़्क़ी

इतना ही नहीं है कि तिरे बिन न रहा जाए

शानुल हक़ हक़्क़ी

इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी

शानुल हक़ हक़्क़ी

हर-चंद कि साग़र की तरह जोश में रहिए

शानुल हक़ हक़्क़ी

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