दिल Poetry (page 119)

है अब की फ़स्ल में रंग बहार और ही कुछ

शानुल हक़ हक़्क़ी

फ़ित्ने जो कई शक्ल-ए-करिश्मात उठे हैं

शानुल हक़ हक़्क़ी

इक महक सी दम-ए-तहरीर कहाँ से आई

शानुल हक़ हक़्क़ी

दुनिया ही की राह पे आख़िर रफ़्ता रफ़्ता आना होगा

शानुल हक़ हक़्क़ी

बिखर जाएगी शाम आहिस्ता बोलो

शानुल हक़ हक़्क़ी

असर न हो तो उसी नुत्क़-ए-बे-असर से कह

शानुल हक़ हक़्क़ी

ऐ दिल तिरे ख़याल की दुनिया कहाँ से लाएँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

ऐ दिल अब और कोई क़िस्सा-ए-दुनिया न सुना

शानुल हक़ हक़्क़ी

लज़्ज़त-ए-वस्ल से भी बढ़ के मज़ा आएगा

शाद अमृतसरी

शॉफ़र

शाद आरफ़ी

औरत

शाद आरफ़ी

उठ गई उस की नज़र मैं जो मुक़ाबिल से उठा

शाद आरफ़ी

'शाद' उफ़्ताद-ए-हर-नफ़स मत पूछ

शाद आरफ़ी

क्या करें गुलशन पे जोबन ज़ेर-ए-दाम आया तो क्या

शाद आरफ़ी

जज़्बा-ए-मोहब्बत को तीर-ए-बे-ख़ता पाया

शाद आरफ़ी

जब तक हम हैं मुमकिन ही नहीं ना-महरम महरम हो जाएँ

शाद आरफ़ी

हुदूद-ए-अक्ल-ओ-शर्ब का सवाल ही नहीं रहा

शाद आरफ़ी

हमारी ग़ज़लों हमारे शेरों से तुम को ये आगही मिलेगी

शाद आरफ़ी

चमन को आग लगाने की बात करता हूँ

शाद आरफ़ी

चाहते हैं घर बुतों के दिल में हम

शाद आरफ़ी

ब-पास-ए-एहतियात-ए-आरज़ू ये बार-हा हुआ

शाद आरफ़ी

अहद-ए-मायूसी जहाँ तक साज़गार आता गया

शाद आरफ़ी

पहली सी लज़्ज़तें नहीं अब दर्द-ए-इश्क़ में

सेहर इश्क़ाबादी

तिरा वहशी कुछ आगे है जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ से

सेहर इश्क़ाबादी

तकमील-ए-इश्क़ जब हो कि सहरा भी छोड़ दे

सेहर इश्क़ाबादी

तकमील-ए-इश्क़ जब हो कि सहरा भी छोड़ दे

सेहर इश्क़ाबादी

रंग उड़ कर रौनक़-ए-तस्वीर आधी रह गई

सेहर इश्क़ाबादी

जिस से वफ़ा की थी उम्मीद उस ने अदा किया ये हक़

सेहर इश्क़ाबादी

हसीनों के तबस्सुम का तक़ाज़ा और ही कुछ है

सेहर इश्क़ाबादी

फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना

सेहर इश्क़ाबादी

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